शिवकिशोर सनाढ्य : शिक्षक व कर्मचारी हितों का प्रखर स्वर

जन्म दिवस (24 मार्च) पर विशेष 
राजस्थान ही नहीं देश के प्रमुख शिक्षक व कर्मचारी नेताओं में एक प्रमुख नाम है- शिवकिशोर सनाढ्य । एक कुशल संगठक, जनप्रिय राजनेता, सतत् प्रवासी, दक्ष शिक्षक, कर्मठ व शुचितापूर्ण सार्वजनिक जीवन जीने वाले शिवकिशोर सनाढ्य ने अपनी अलग पहचान बनाई।
24 मार्च 1935 को मथुरा (उत्तर प्रदेश) में पिता पं. ज्योतिप्रसाद व माता रामश्री के आंगन में बालक का जन्म हुआ। मात्र आठ वर्ष की आयु में माताजी का निधन होने के पश्चात बहिन किरण व बहनोई बिहारीलाल के साथ वे उदयपुर आये और फिर मेवाड़ व पूरा राजस्थान उनका कार्यक्षेत्र हो गया। उदयपुर में आपका निवास बरसों तक श्रीनाथ जी की हवेली रहा। बचपन में मेरा निवास समीप ही कांजी का हाटा में होने व तभी संघ के सम्पर्क में आने से मेरा परिचय विद्यालय जीवन में हो गया। एक बार जो शिवजी के सम्पर्क में आया, वो उनका होकर रह गया। मुझे दीर्घावधि तक आपका स्नेह , सानिध्य व मार्गदर्शन मिला।


राजस्थान में शिक्षक नेताओं में दो नाम प्रमुख नाम आते है बिशनसिंह शेखावत व शिवकिशोर सनाढ्य दोनों का जीवन लगभग एक जैसा। दोनों अपने सिद्धांत व विचारधारा के प्रति निष्ठ रहे। दोनों में जीवनभर सहमति-असहमति दोनों साथ-साथ चलती रही, लेकिन परस्पर सद्भाव व सम्मान शिष्टाचार की वे मिसाल थे, जब शिक्षक व कर्मचारी हित की बात आई तो दोनों ने एक साथ हुंकार भरी। एक बार कर्मचारी आंदोलन में बिशनसिंह शेखावत को लम्बी भूख हड़ताल के बाद पुलिस ने अस्पताल में भर्ती करा दिया। हड़ताल असफल होने का अंदेशा था। उस समय शिक्षक संघ सनाढ्य व शेखावत दो अलग अलग गुटों में संचालित था। फिर भी बात कर्मचारी हित की थी तो सनाढ्य अलग गुट का विचार छोडकर तुरंत शेखावत के पास अस्पताल गये और कहा आप चिंता न करे, मैं आंदोलन में सम्मिलित हो रहा हूं। उसके बाद उन्होंने अपना पूरा सामर्थ्य आंदोलन की सफलता में लगा दिया। लगभग दस हजार राज्य कर्मचारी जेल गये थे। आंदोलन प्रखर हो गया। राज्य सरकार को झुकना पडा, हड़ताल में जेल गये कर्मचारियों की जेल अवधि को भी ऑन ड्यूटी माना गया। उसी आंदोलन के समझौते से पहला राणावत वेतन आयोग बना व महगांई भत्ते का नया फार्मूला बना।
एक बार कर्मचारी आंदोलन के बीच जयपुर से दूरभाष संदेश मिला, कल सुबह जयपुर में राज्य सरकार के साथ वार्ता है, आपको उसमें रहना है। रात्रि में कोई व्यवस्था न होने वे अपने मित्र हर्षलाल नंदवाना के साथ मोटरसाइकिल पर उदयपुर से जयपुर गये। रात रास्ते में मोटर साइकिल चलाते समय नींद न आ जाये इसके लिये थोडी थोडी देर में भजन गाते रहे और नारे लगाते रहे। रातभर मोटरसाइकिल फर सफर करके सुबह जयपुर में वार्ता में शामिल हुए। कर्मचारी आंदोलन में उनकी गिरफ्तारी के प्रयासों से पुलिस के साथ आंखमिचौनी के भी संस्मरण है, पुलिस उन्हें तब तक गिरफ्तार नहीं कर पाई, जब उन्होंने स्वयं सत्याग्रह करके गिरफ्तारी न दी हो। “पाना है, तो खोना सीखो, कदम-कदम पर लडना सीखो” कर्मचारी नेता के रुप में उनके भाषण में यह उद्घोष अवश्य रहता था। वे कहते थे, आंदोलन में शामिल कर्मचारी या श्रमिक का स्वाभिमान व मान-सम्मान किसी भी मांगपत्र से अधिक महत्वपूर्ण है, उस पर कोई समझौता नहीं होना चाहिये। आंदोलन के बाद वो उसी सम्मान व गरिमा से काम पर लौटना चाहिये।
शिक्षक व कर्मचारी जगत में लम्बे समय तक नेतृत्व करने के बाद 1989 में शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्ति के बाद उनकी राजनीतिक पारी प्रारंभ हुई।
सन् 1990 के विधानसभा चुनाव में उनका नाम उदयपुर शहर विधानसभा से चर्चा में था। चुनावी सरगर्मियां जोरों पर थी, स्वाभाविक है ऐसे समय में टिकटार्थियों के दौरे जयपुर या दिल्ली में होते है। ऐसे समय में शिवजी अपने निकटतम मित्र जी.वी. दामले की धर्मपत्नी को चिकित्सा के लिये अहमदाबाद ले गये, जो दुर्घटना में घायल हो गयी थी।
विधायक चुने जाने के बाद जयपुर में 14 विधायकपुरी उनका सरकारी निवास हो गया। जो आवास पहले विधायक गुलाबचंद कटारिया को आवंटित था, वही वे जयदेव पाठक के साथ रहते थे। शिवजी वहां उपलब्ध हो या न हो वो आवास स्वजनों के लिये हमेशा खुला रहा। प्रत्येक अतिथि के प्रातः चाय व अल्पाहार की व्यवस्था वे स्वयं करते थे।
राजनीति में वे अपने नेतृत्व पर उस ट्रेड यूनियन के श्रमिक की तरह विश्वास रखने को कहते थे, जिस श्रमिक के पास कल के लिये दो पैसे नहीं होते, लेकिन वो अपने नेतृत्व के आव्हान पर काम छोड़कर आ जाता है, वो श्रमिक प्रेरणा देने वाला है, उसके सम्मान की रक्षा उस नेता भी दायित्व है।
राजनीति में रहकर भी उन्होंने कभी अपनी आत्मा की आवाज से कभी समझौता नह़ीं किया। मंच विधानसभा का हो या संगठन का। शिवजी ने हमेशा अपना पक्ष बेबाकी से रखा और अपने सिद्धांत के लिये अपने निकट व्यक्ति को भी स्पष्ट बात कहने में कभी गुरेज नहीं किया। चाहे इसके लिये उन्हें संघर्ष भी करना पड़ा, लेकिन वे सदैव अडिग रहे। अपने पास आने वाले व्यक्ति की बात व दुख दर्द सुनना, मदद संभव है या नहीं स्पष्ट उत्तर देना। प्रत्येक पत्र का उत्तर देना, उनका स्वभाव था।
विधायक के बाद वे उदयपुर में नगर विकास प्रन्यास के अध्यक्ष नियुक्त हुए। उदयपुर में यूआईटी की दक्षिणी विस्तार योजना व गौरव पथ का निर्माण उन्हीं के कार्यकाल में हुआ। सन् 2005-6 में हुई अतिवृष्टि में उदयपुर में विभिन्न कॉलोनियों में जलभराव हो गया। शिवजी अपने विभाग का अमला साथ लेकर रातभर भर लोगों को राहत देने में लगे रहे।
18 मार्च 2019 को उनका उदयपुर में निधन हो गया।
उनके साथ जयपुर, अहमदाबाद, अजमेर, भीलवाड़ा, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, सलूम्बर व ऋषभदेव सहित विभिन्न स्थानों पर जाना हुआ। उनके साथ हुई यात्राएं सदैव अविस्मरणीय रहेगी।
डॉ. विजय विप्लवी
(लेखक भाजपा नेता है, उदयपुर में पार्षद रहे है)

By Udaipurviews

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