कला अमूर्त को समझने की साधना है
उदयपुर, 01 सितम्बर। अमूर्त ही सृष्टि का आदि स्वरूप है। यह कस्तूरी मृग के कौतुहल के समान है। जिस तरह मृग कस्तूरी की महक को जंगल में भटकते हुए बाहर ढूंढता है, लेकिन महक उसके भीतर होती है, उसी प्रकार अमूर्त का मूर्त रूप भी भीतर है और उसी अमूर्त को समझने की साधना का नाम कला है।
यह भाव शुक्रवार शाम को सूचना केंद्र की कला दीर्घा में सृजनधर्मियों की विचार गोष्ठी के सार स्वरूप प्रस्तुत हुए। अवसर था राजस्थान साहित्य अकादमी के तत्वावधान में चल रही पांच दिवसीय शब्द रंग प्रदर्शनी के समापन का।
ख्यातनाम कवियों की सृजनाओं को रंगों से उकेर कर जीवंत सा कर देने वाले जाने माने चित्रकारों की कलाकृतियां की प्रदर्शनी गत 28 अगस्त को प्रारंभ हुई थी। पांच दिनों के दौरान उदयपुर सहित अन्य क्षेत्रों से आए कला मर्मज्ञों, सृजनधर्मियों, कला प्रेमियों ने प्रदर्शनी का अवलोकन कर अकादमी के इस नवाचार की भूरी-भूरी प्रशंसा की। शुक्रवार को प्रदर्शनी के समापन अवसर पर भी अभिनव पहल करते हुए जाने-जाने कलाधर्मियों की संगोष्ठी रखी गई। इसमें चित्रकार, वास्तु कला, साहित्य आदि विविध क्षे़त्रों से जुड़े सिद्धहस्त लोगों ने शिरकत की।
दर्द बांटते रहेंगे तो कलाएं जिन्दा रहेंगी :
बतौर अतिथि अपने संबोधन में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. कुंदन माली ने कहा कि अकादमी ने शब्दों को रंगों में उकेरने की पहल करते हुए कला और साहित्य के चिरंतन संबंध को सुदृढ़ किया है। उन्होंने इस अनूठे आयोजन के लिए आयोजकों के प्रयासों की सराहना की। वास्तुकार व स्केच आर्टिस्ट सुनील लड्ढा ने कहा कि कला साधना के साथ-साथ उससे संबंधित चिंतन की भी जरूरत बताई और सभी कलाओं का आधार श्रीमदभगवदगीता को बताया। गोष्ठी में आरजे रजत ने कहा कि कलाएं संवेदना पर आधारित हैं, जब तक एक-दूसरे का दर्द बांटते रहेंगे, तब तक भाव जिन्दा रहेंगे और भाव रहेंगे तो यह भाव सृजन का रूप लेते रहेंगे। वर्तमान दौर में संवेदनहीनता के कारण अमूर्तन को नहीं समझ पा रहे। आर्टिस्टिक सेंस कम होता जा रहा है। वरिष्ठ चित्रकार रघुनाथ शर्मा ने कहा कि साहित्य और कला एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। भले ही नाम अलग-अलग हो लेकिन यह सभी अभिव्यक्ति का माध्यम हैं। शब्द और रंग को साथ लाकर किया गया नवाचार निश्चित रूप से कला के भविष्य के लिए सुखद रहेगा। मदनसिंह राठौड़ ने कहा कि कला का मूल आकार है, रूप नहीं। रूप तो नगण्य है, आकार महत्वपूर्ण है। शब्द रंग के जरिए उसी आकार की प्रधानता को पुनर्स्थापित करने की अच्छी पहल की गई है। संयुक्त निदेशक जनसंपर्क डॉ कमलेश शर्मा ने सृजन की भाषा को कम्प्यूटर की बॉयनरी लैंग्वेज के माध्यम से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार कम्प्यूटर सिर्फ बॉयनरी कोड समझता है, जो ही अमूर्त है। उसी प्रकार सृजनधर्मी भी अमूर्त को अपनी कल्पनाओं और भावों में पिरो कर मूर्त रूप में प्रस्तुत करता है। उन्होंने प्रदर्शनी को कला-साहित्य को संबल देने के संकल्प का शुभारंभ बताया।
कार्यशाला को डॉ. कुंजन आचार्य, गीतकार कपिल पालीवाल, डॉ. सुरेन्द्र चुंडावत, रंगकर्मी दीपक दीक्षित, रवीन्द्र दाहिमा, डॉ. जगदीश कुमावत, डॉ. प्रेषिका द्विवेदी, डॉ. भूमिका द्विवेदी, बाबू किशोर प्रजापत, अरूण त्रिपाठी, डॉ. सोमशेखर व्यास आदि ने भी विचार व्यक्त किए।
इस मौके पर चित्रकार नवलसिंह चौहान ने एक साहित्यकार का लाइव पोट्रेट भी बनाया वहीं समस्त संभागियों ने कैनवास पर अक्षर उकेर कर कलासाधना के प्रति अपनी प्रतिबद्धता उजागर की। शिविर संयोजक चेतन औदिच्य ने अतिथियों का स्वागत किया।
इन चित्रकारों का किया सम्मान :
कला प्रदर्शनी में शब्दों के संग रंगों से निखरी प्रदर्शनी में चित्रकार हेमन्त जोशी, रवीन्द्र दाहिमा, जगदीश कुमावत, डॉ. चित्रसेन, नीलोफर मुनीर, दीपिका माली, इति कच्छावा, प्रेषिका द्विवेदी, दीपक सालवी, सुरेन्द्र सिंह चुंडावत, अनिल मोहनपुरिया, सुनील नीमावत, नवल सिंह चौहान, सूरज सोनी, शहनाज मंसूरी, कुमुदिनी भरावा, अमित सोलंकी, मुकेश औदिच्य, सोनम फुलवारिया, नक्षत्रा चौबीसा, प्राथी सिकलीगर, बंटी सुथार, कबीर मेघवाल व योगेश डांगी द्वारा तैयार की गई कलाकृतियों के लिए अतिथियों ने स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया।
सृजन को संबल के संकल्प के साथ शब्द रंग प्रदर्शनी का समापन
