आयड़ जैन तीर्थ में बह रही है धर्म ज्ञान की गंगा
उदयपुर, 24 नवम्बर। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में शुक्रवार को चातुर्मासिक मांगलिक प्रवचन हुए। महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ के आत्म वल्लभ सभागार में सुबह 7 बजे दोनों साध्वियों के सानिध्य में ज्ञान भक्ति एवं ज्ञान पूजा, अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने परमात्मा के जिन मंदिर में दशत्रिकों का पालन करना चाहिये इस पर विवेचन करते हुए आज दसवाँ प्रणिधान त्रिक के विषय में बताया कि मन का प्रणिधान, वचन का प्रणिधान और काया का प्रणिधान । प्रणिधान यानी प्रारंभ किये गये चैत्यवंदनादि अनुष्ठानों में मन, वचन काया के योगों को लयलीन, तन्मय एकाकार बना देना। पहला प्रणिधान मन का प्रणिधान शुरु की गयी क्रिया विधि में ही मन को पिरोना, उसके सिवाय के किसी भी विचार का मन में प्रवेश नहीं होने देना। दूसरा प्रणिधान वचन का प्रणिधान- जो सूत्रोच्चार चल रहा हो, उसके उच्चारण पर व संपदा का पूरा ध्यान रखकर सूत्र बोलने चाहिये । तीसरा प्रतिरोधान कायां का प्रणिधान जिस मुद्रा में क्रिया करनी उसी मुद्रा में शरीर को बनाकर अन्य पाप चेष्टाओं का परित्याग करना चाहिये। जानी भगवंत कहते हैं कि सर्व आराधनाओं का मुक्त आधार है प्रणिधान । जिस आराधना में मन, वचन काया के योग तदाकार नहीं बनते, वह आराधना उत्कृष्ट फल नहीं दे सकती। क्रिया योग में जुडऩा आसान है, परन्तु जुडऩे के बाद मन, बचन साया के तूफानी घोड़े को काबू में रखना बहुत कठिन है! हृदय में अहोभाव, सद्भाव और भक्ति रखते हुए विधि का मन बचन काम से पालन किया जाय तो जिनपूजा, जिन दर्शन अवश्य लाभदायी सिद्ध होती है। संकटों को दूर कर करके अवश्य अभ्युदय को प्राप्त कराती है। अंत में यही कहना है कि हमें दशोंत्रिकों का पालन करते हुए आराधना करनी है ताकि हमारी आराधना ताबा मिटकर सोना बन जाये और कोपर सोने में ट्रास्फट हो जाये – यही शुभ भावना। चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
परमात्मा के जिन दर्शन-पूजन में प्रणिधान त्रिक का पालन करें : साध्वी वैराग्यपूर्णाश्री
