आयड़ जैन तीर्थ में अनवरत बह रही धर्म ज्ञान की गंगा
– साध्वियों के सानिध्य में अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की
उदयपुर 11 अक्टूबर। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में बुधवार को मास क्षमण का तप की साधना करने वाले श्रावक-श्राविकाओं का वरघोड़ा निकाला गया। महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ के आत्म वल्लभ सभागार में सुबह 7 बजे दोनों साध्वियों के सानिध्य में आरती, मंगल दीपक, सुबह सर्व औषधी से महाअभिषेक एवं अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि विशेष महोत्सव के उपलक्ष्य में प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने नौ अंग की पूजा करते समय संक्षिप्त में भावों के चिंतन में बताया कि हे परमात्मा ! आपने नव तत्व का उपदेश दिया इसलिए नौ अंग की पूजा की। शुभवीर मुनि भगवंत कहते हैं कि परमात्मा की बहुत ही राग से प्रीति से पूजा करनी चाहियो तभी हमारे आत्मा पर पड़े हुए राग और द्वेष जैसे अवगुणों को परमात्मा की पूजा से एवं जिन शासन के प्रति उत्कृष्ट राग का आलंबन लेकर मिटा सकते हे क्योंकि वही एक मात्र स्थान है जो सर्व गुणों का हैं। हर अंग के पास पूजा करते समय कौन सा भाव पैदा करके कौन से गुण की याचना करनी चाहिए जिसके पास पूजा के लिए बहुत कम समय है वह भी इस प्रकार चिंतन करके पूजा करें। अंगुठे की पूजा करके युगलिक मनुष्यों ने विनय प्रदर्शित किया। मुझे भी इस अंगूठे से विन निय गुण प्राप्त हो, जिससे संसार सागर का अंत पा सकुँ। घुटने से पराक्रम करके प्रभुने केवलज्ञान प्राप्त किया वैसे मेरे घुटने धर्म की क्रिया में अप्रमत्त बने और पाप क्रिया से पीछे हरे प्रभु के हाथों ने बरसीदान दिया। परमात्मन् ! मेरा हाथ भी बरसीदान देकर कब दीक्षा ग्रहण करेगा? प्रभु के स्कंध (कंधे) में से अभिमान चला गया और मे तो मा अभिमानी का आकार हूँ। मेरे अभिमान रूपी कपाय भाव की मुक्ति हो ऐसी याचना करता हूँ शिरशिखा वह सिद्धशिका का प्रतीक है। वह अनंत सिद्धों की पूजा से मेरी सिद्धिका होगी? ऐसी याचना करना। तीर्थकर नामकर्म के से तीन पुण्य भुवन में प्रभु आपकी सेवा होती है। हे परमात्मा ! आप तीन भुवन में तिलक समान हो। मैं आपका तिलक करके स्वयं तीर्थकर होकर मोक्ष में जाऊं। कंठ की पूजा से यह सोचना है कि इस कंठ ने देशना दी, ऐसी देशना मुझे कब सुनने को मिलेगी। ऐसी भावना करना। हे परमात्मा! आपने हृदय में उपशम भाव धारण किया और राग-द्वेष को जला दिया। इस हृदय की पूजा से में भी उपशम भाव पैदा करूं ऐसी याचना करना। नाभिकमल के आठ रूचक प्रदेश सकल गुणों का विश्राम स्थान है, उसी प्रकार मेरे सभी आत्म प्रदेश रक्तक गुणों का विश्राम स्थान बनें। अर्थात उ कर्म रहित बने ऐसी आत्मा याचना करता हूँ। इस प्रकार परमात्मा की पूजा करते समय थोडे समय मैं भी अच्छी तरह भावित होना है और निर्जरा का लाभ लेना है तो हमें ऐसी भावना अवश्यमेव करनी चाहिए। और अपने कर्मों का क्षय करके मुक्ति मंजिल को पाना है। भावों से ही भवों का नाश होता है। भाव ही प्रधान है। भाव ही कर्म क्षय करने का माध्यम है। भावों के चिंतन मँ आरूढ़ होकर अपने इच्छित फल को प्राप्त करना है। चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर पर्युषण महापर्व के तहत प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
परमात्मा के नव अंग की पूजा भाव पूर्वक करें : साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री
