विद्यापीठ – विज्ञान संकाय
स्थायी मानव जीवन के लिए स्वस्थ पर्यावरण
विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ आयोजन
परम्परागत कृषि की ओर लौटने की जरूरत ……..
उदयपुर 21 जून / प्रकृति सिर्फ मानवजाति की बपौती नहीं है इस पर लाखों प्रजातियों जीवों, वनस्पति, जीव, जंतु, पैड़-पौधे, वन्य पक्षी के साथ असंख्य जीवों का भी अधिकार है जिस दिन हम सोचेंगे कि ये भी हमारा परिवार है, उस दिन हमारी समस्या स्वतः ही समाप्त हो जायेगी। विकास के नाम पर हम पर्यावरण का दोहन करते जा रहे है। पर्यावरण से लेने के साथ देने का भी रखें। जल, नदी व जंगल हमारे लिए केवल प्राकृतिक वस्तुएॅ नहीं हैं, ये तो हमारे अस्तित्व व आत्मा से जुड़े हैं। इनसे हमें उतना ही प्रेम है जितना स्वयं से है। पर्यावरण सुरक्षित रहेगा तभी मानव सभ्यता जीवित रहेगी। पर्यावरण के प्रति आम व्यक्ति चिंतित है , आवश्यकता है चिंतन करने की। अखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी। इसके कारणों में जाना होगा। मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो आज के लिए भी रखना चाहता है और भविष्य के लिए भी रखना चाहता है। जबकि वह जानता है कि हर चीज खत्म होने वाली है। जिस पानी की हमें वर्षो तक जरूरत है, कलयुग के करोड़ों वर्ष बचे हुए है फिर भी इंसान इससे अनजान है। हमें हमारी भावी पीढ़ी के लिए भी कुछ छोड़ का जाना होगा। उक्त विचार शुक्रवार को जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय के विज्ञान संकाय के बोटनी विभाग की ओर से स्थायी मानव जीवन के लिए स्वस्थ पर्यावरण विषय पर आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में एमपीयूटी के कुलपति प्रो. अजित कुमार कर्नाटक ने बतौर मुख्य अतिथि के रूप में कही। प्रो. कर्नाटक ने विद्यापीठ के संस्थापक जनुभाई को नमन करते हुए कहा कि 1937 में संस्था की स्थापना की जब अंग्रेजों का राज था। अंग्रेजों ने सिर्फ बाबू बनाने की शिक्षा दी। वो चाहते थे कि आप अच्छे सहायक बनें, लेकिन अफसर नहीं, उस समय जनुभाई ने शिक्षा की अलख जगाई। आज संस्थान की राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान है।
संगोष्ठी में एमपीयूटी के पूर्व कुलपति प्रो. उमाशंकर शर्मा, प्रो.़ शांति कुमार शर्मा, प्रो. एसडी पुरोहित, पर्यावरणविद् प्रो. सतीश कुमार शर्मा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमें विरासत में मिले पर्यावरण को सुरक्षित रखना होगा और उतना ही दोहन करना होगा, जितनी हमें इसकी आवश्यकता है। एक किलो चावल की पैदावार करने में 1800 लीटर पानी खर्च होता है, हमें हमारी परम्परागत खेती की ओर बढ़ना होगा। शिक्षाविद्ों ने कहा कि पहले नारा दिया था रोटी, कपड़ा और मकान । लेकिन अब आवश्यकता है जल, जंगल, जमीन को जिंदा रखने की। अगर ये बचेंगे तभी हमारी सभ्यता जीवित रहेगी। आज बड़े शहरों से आमजन का पलायन हो रहा है। बैंगलोर में पानी की भारी कमी है वहॉ एक टैंकर 5 हजार में बिक रहा ह, देश की राजधानी दिल्ली में जल के लिए अनशन हो रहा है, फिर भी आपूर्ति नहीं हो पा रही है। हमें हमारी लाईफ स्टाईल को बदलना होगा।
प्रारंभ में निदेशक डॉ. सपना श्रीमाली ने अतिथियों का स्वागत करते हुए एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की जानकारी दी।
संचालन डॉ. हरीश चौबीसा, सिद्धिमा शर्मा, ने किया जबकि आभार डॉ. उत्तम प्रकाश शर्मा ने जताया।
इस अवसर पर परीक्षा नियंत्रक डॉ. पारस जैन, डॉ. युवराज सिंह राठौड़, डॉ. उत्तम प्रकाश शर्मा, डॉ. जयसिंह जोधा, मंगलश्री दुलावत डॉ. भावेश जोशी, डॉ. दीप्ति सोनी, डॉ. योगिता श्रीमाली, डॉ. खुशबू जैन, सुश्री सिद्धिमा शर्मा, शक्तिका चौधरी, लालिमा शर्मा, डॉ. पूजा जोशी, डॉ. हिमानी वर्मा, सहित संकाय सदस्य, विद्यार्थी व पीएचडी स्कोलर्स उपस्थित थे।
