एआईसीटीई स्वीकृत ‘सार्वभौमिक मानवीय मूल्य आधारित शिक्षा’ विषयक तीन दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम का हुआ समापन
उदयपुर, 26 अप्रैल। सीमित परिवारवाद के संस्कारों में पले-बढ़े व्यक्ति का समाज में महत्वपूर्ण स्थान होता है। व्यक्ति के भीतर यदि सही समझ विकसित हो जाए तो समाज में सहयोग, श्रद्धा और समर्पण की पूर्ण हार्मोनी स्थापित की जा सकती है। इसी आधार पर जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटी) के प्रबंध अध्ययन संकाय में एआईसीटीई स्वीकृत ‘सार्वभौमिक मानवीय मूल्य आधारित शिक्षा’ विषयक संकाय विकास कार्यक्रम के तृतीय दिवस के विभिन्न सत्रों का समापन हुआ।
समारोह में मुख्य वक्ता जलपुरुष के नाम से विख्यात पर्यावरणविद् राजेन्द्र सिंह ने कहा कि विद्यार्थी के गुणों को निखारने का सशक्त मार्ग शिक्षक होता है। उन्होंने कहा कि मानवीय मूल्यों को पुनः स्थापित करना तथा भारतीय विद्या को यथार्थ रूप में जीवित करना आज की शिक्षा का अनिवार्य उद्देश्य होना चाहिए। शिक्षा को विद्या के साथ समन्वयित करने से ही संस्कार और मूल्य स्वतः विकसित होंगे। उन्होंने नवसृजन और संकल्प की दिशा में शिक्षक की भूमिका को अत्यंत महत्वपूर्ण बताया और कहा कि सही दिशा में नवाचारपूर्ण विचारों को क्रियान्वित करना समय की मांग है।
कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि ‘सुबह का आकलन’ यानी दिन की शुरुआत आत्मविश्लेषण और गंभीरता के साथ करना आवश्यक है। स्नेह, श्रद्धा और विश्वास परस्पर संबंधों की रीढ़ हैं और शिक्षक का कर्तव्य है कि वह ज्ञान की प्रकृति को पहचानते हुए निरंतर सीखने की भावना को बनाए रखे। उन्होंने कहा कि ज्ञान की चेतना का विस्तार ही शिक्षक की वास्तविक जिम्मेदारी है और ऐसे अवसर उसके लिए सीखने का सशक्त माध्यम बनते हैं।
एआईसीटीई की ओर से आरआईइटी जयपुर से प्रशिक्षक के रूप में डॉ. बीके शर्मा ने विभिन्न सत्रों के माध्यम से कहा कि आज की दुनिया में असंतुलन, संसाधनों की भरमार के बावजूद उनका सदुपयोग न हो पाना एक गंभीर विषय है। उन्होंने कहा, “स्व में संयम का भाव होना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि वही व्यक्ति अपनी जिम्मेदारियों को समझ पाता है।”
बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय से प्रशिक्षक डॉ. अलका स्वामी ने संबंधों में विश्वास की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “हर संबंध की नींव विश्वास पर टिकी होती है, और वही प्रेम का मूल है।”
उन्होंने सहज स्वीकृति, पवित्र मनोभाव और देश के अनुकूल विकसित इच्छाओं को व्यक्ति की आंतरिक प्रगति के लिए आवश्यक बताया। साथ ही पर्यवेक्षक डॉ. सरोज लखावत ने भी विचार व्यक्त किए।
कार्यक्रम का संचालन समन्वयक डॉ. चंद्रेश छतलानी ने किया। इस अवसर पर कोटा विश्वविद्यालय से अनीता सुखवाल एवं राजस्थान विद्यापीठ से डॉ.हीना खान ने तीन दिवसीय प्रशिक्षण के अनुभव साझा किए। उन्होंने संयम की भावना के विकास की आवश्यकता पर बल देते हुए आज के संदर्भ में विद्यार्थियों में संस्कारों की कमी के कारणों और उनके समाधान आदि सीखे गए विषयों पर प्रकाश डाला।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन कार्यक्रम संयोजक, प्रबंध अध्ययन संकाय की डॉ. नीरू राठौड़ ने दिया।
