उदयपुर, 3 सितम्बर। श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक श्रीसंघ के तत्वावधान में मालदास स्ट्रीट स्थित आराधना भवन में चातुर्मास कर रहे पंन्यास प्रवर निरागरत्न विजय जी म.सा. ने मंगलवार को धर्मसभा में कहा कि पर्युषण आत्मा को उस पार पहुंचाने वाला पावन पर्व है। इस पर्व की सुंदरतम किरणें आत्मा के अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का उजाला हमारे जीवन में फैलाती है। विनय बिना विद्या और सुगंध बिना पुष्प की शोभा नहीं होती, वैसे ही पर्युषण पर्व की सुंदरतम साधना, आराधना, उल्लास के बिना नहीं होती। वर्तमान में हम जितना अच्छा कर रहे हैं उससे ज्यादा तो गलत करते हैं तो अभ्यास गलत का ही रहेगा। पिछले जन्म में भी गलत ही करके आए तो संस्कार गलत ही पड़ेंगे। वर्तमान और भूतकाल दोनों में गलत जगह पर ही प्रेम-स्नेह रखा जिससे भविष्य भी गलत का ही अनुराग रहेगा। इन तीनों गलत को दूर करने के लिए कल्पसूत्र में दस प्रकार के आचार का पालन को रामबाण उपाय बताया है। कल्पसूत्र में प्रभु वीर के 27 भवों का वर्णन विस्तार से किया गया है उसमें भी मुख्य 7 भव का वर्णन आज किया गया है। इन सात भव में महावीर प्रभु की अलग-अलग प्रकार के नेचर का वर्णन किया गया है। 27वें भव में सेविंग नेचर है, सबको बचाने की भावना। चातुर्मास प्रवक्ता राजेश जवेरिया ने बताया कि आज प्रवचन प्रारम्भ से पूर्व कल्पसूत्र ग्रंथ की पूजा की गई। बाहर से दर्शनार्थियों का निरन्तर आवागमन हो रहा है।
पर्युषण आत्मा को उस पार पहुंचाने वाला पावन पर्व है : निरागरत्न
