उदयपुर। सूरजपोल स्थित दादाबाड़ी में साध्वी विपुल प्रभा श्रीजी ने कहा कि मोक्ष के लिए मनुष्य गति आवश्यक है। चार गतियों से नही चारित्र से मोक्ष मिक सकता है। मनुष्य गति मिली है तो आपके हाथ में है कि अपना जीवन किस ओर जाना है। रोज का जीवन निर्भर करता है कि हम क्या कर रहे हैं। खुद का रोज आकलन कर रहे हैं।
जीवन पर सब निर्भर है कि कैसे चला रहे हैं। धर्मवाद और धनवाद। धर्ममय और धनमय। शब्द का फर्क सिर्फ एक ही है लेकिन जीवन इधर से उधर हो जाता है। हमारी दौड़ धर्म के पीछे है या धन के पीछे। धन दिखता है इसलिए उसके पीछे सब दौड़ रहे हैं, धर्म अभी नही दिखता इसलिये उधर कोई नही जा रहा। चोट लगे तो मरहम और खांसी आने पर टॉनिक देते हैं। हम उसका उल्टा कर रहे हैं। खांसी होने पर बाहर से मलहम लगाएंगे तो खांसी ठीक नही होगी। जिसका उपयोग जहां करना है, वहां करेंगे तो ही उपचार होगा। हम अभी कर्म की बीमारी से जूझ रहे हैं। मंदिर में कोई देखे तो 100 का नोट और कोई नही देखे तो 10 का फटा टूटा नोट। किसको दिखा रहे हैंम भगवान तो देख ही रहा है।
साध्वी विरल प्रभा श्रीजी ने कहा कि परमात्मा को इससे कोई फर्क नही पड़ता लेकिन हम अपने ही साथ धोखा कर रहे हैं। परमात्मा यो वीतरागी है। उन्हें कोई फर्क नही पड़ेगा। हमारा रिश्ता अभी धन से जुड़ा है ऐसा रिश्ता परमात्मा से जोड़ना है। जब मन में लगे कि मंदिर जाना ही है, सामायिक करना ही है, तब सोचना कि परमात्मा बुला रहा है। ऐसा रिश्ता कायम करना है। धर्म टॉनिक है और धन मरहम। मरहम बाहर से लगाना है और टॉनिक को पीना है ताकि उपचार सही हो जाये। हम धर्ममय जीवन बनाये, धनमय तो अपने आप बन जायेगा। धन को तिजोरी में रखा, धर्म को बाहर बताया। करना इसका उल्टा है। साध्वी कृतार्थ प्रभा श्रीजी ने गीत प्रस्तुत किया।
हमारी दौड़ धर्म के पीछे है या धन के पीछेः विपुलप्रभाश्री
