शैक्षिक समस्याओं के निदान हेतु क्रियात्मक अनुसंधान विषय पर
प्रो. बी.एस. गर्ग द्वितीय व्याख्यानमाला का हुआ आयोजन
क्रियात्मक अनुसंधान से मिलती है तनावमुक्त उन्नति की राह – प्रो. सारंगदेवोत
उदयपुर 25 सितम्बर / जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलाधिपति प्रो. बीएस गर्ग की स्मृतियों को चिर स्थायी बनाये रखने के उद्देश्य से लोकमान्य तिलक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय के जनुभाई सभागार में शैक्षिक समस्याओं के निदान हेतु क्रियात्मक अनुसंधान विषयक प्रो. बीएस गर्ग द्वितीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया।
अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. एस. एस. सारंगदेवोत ने कहा कि संस्थान के नींव के पत्थर को याद करना हम सभी की जिम्मेदारी है। प्रो. गर्ग ने संस्थान में 68 वर्ष की अपनी सेवाएॅ दी, 18 वर्षो तक कुलाधिपति के रूप में वह इससे पूर्व कुल प्रमुख के रूप में कार्य कर विश्वविद्यालय को उंचाईयों पर पहुंचाया। प्रो. सारंगदेवोत ने कहा कि विद्यार्थियों के साथ-साथ शिक्षण संस्थानों की उन्नति में क्रियात्मक अनुसंधान का महत्वपूर्ण स्थान है जो न केवल सिर्फ हमें एक दिशा प्रदान करता है अपितु सब की उन्नति एवं समरस और सद्भाव का आधार भी प्रदान करता है। उन्होंने अनुसंधान के साथ-साथ सर्वांगीण विकास और कार्यकर्ताओं में वर्क स्किल बढ़ाने तथा तनावपूर्ण वातावरण को कम करने पर भी विशेष चर्चा की। उन्होंने प्रतिबद्धता , सहयोग, सरोकार सामंजस्य तथा परिवर्तन को अपने जीवन में अपनाने की बात कही जिसके माध्यम से हम व्यावसायिक जीवन और कार्य क्षेत्र को भी तनाव मुक्त बना सकते हैं, साथ ही साथ अपने मानसिक स्वास्थ्य को भी पोषित और उन्नत कर सकते हैं।
प्रमुख वक्ता हरियाणा विश्वविद्यालय की प्रो. नीरजा धनकर ने शिक्षकों के कार्यों एवं उनके द्वारा निभाए जा रहे अलग-अलग दायित्वों के स्वरूप के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए उनके निर्वहन के दौरान आने वाली समस्याओं पर विस्तार से विधार्थियों से चर्चा की । प्रो. धनखड़ ने समस्याओं के पीछे विद्यार्थियों की प्रवृत्तियां विस्तार से चर्चा की तथा उनकी संभावित कारणों और निवारणों दोनों को ही सहज और सरल उदाहरण के द्वारा अपने व्याख्यान में प्रस्तुत किया। इसी के साथ उन्होंने शिक्षा जगत से जुड़े प्रशासकों उनके दायित्वों और समस्याओं को भी बहुत बारीकी से बताया एवं उन्हें शिक्षकों की स्वयं की प्रवृत्तियां और उनके मनोवैज्ञानिक पहलुओं को बताते हुए विस्तार से चर्चा की, साथ ही साथ उन्होंने इन सब बातों के पीछे के कारण और निवारण को भी सहज और सरल उदाहरण के माध्यम से अपनी व्याख्यान के दौरान प्रस्तुत किया। उन्होंने वर्तमान में कोटा शहर में हो रही विद्यार्थियों की आत्महत्याओं को आधार बनाकर शैक्षिक जगत में मनोवैज्ञानिक बातचीत एवं परामर्श की महत्वता को रेखांकित किया।
प्रो. धनकर ने शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े प्रशासकों की भूमिका और उनके समक्ष आने वाली समस्याओं पर भी विचार व्यक्त किया और उनके सामान उनके समाधान पर भी चर्चा की । प्रो. धनखड़ ने क्रियात्मक अनुसंधान के माध्यम से बताया कि किसी भी शिक्षण संस्थान में प्रशंसकों शिक्षकों विद्यार्थियों से जुड़ी किसी भी प्रकार की समस्याओं के कारण और उनके निवारण हेतु किए जाने वाले प्रयासों के माध्यम से ही विद्यालय महाविद्यालय और विश्वविद्यालय के स्तर को उन्नत बनाया जा सकता है और इन्हीं छोटे-छोटे अनुसंधानों जो कि किसी बड़े पुरस्कार या योजना के तहत ना किया जाकर मनोवैज्ञानिक आधार को मानते हुए विद्यार्थियों और शिक्षा से जुड़े तत्वों की उन्नति हेतु किए जाते हैं को प्रमुख रूप से शैक्षिक व्यवस्था में शामिल किए जाने की बात कही ।
प्रारंभ में महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. सरोज गर्ग से अतिथियांें का स्वागत करते हुए व्याख्यानमाला की जानकारी दी। संचालन डाॅ. हरीश चैबीसा ने किया जबकि आभार डाॅ. रचना राठौड़ ने जताया।
इस मौके पर डाॅ. अमी राठौड़, डाॅ. सुनिता मुर्डिया सहित संकाय सदस्य एवं विधार्थी उपस्थित थे।
