राष्ट्रहित में क्रियात्मक व गुणात्मक शोध की जरूरत  – प्रो. सारंगदेवोत

दस दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का हुआ समापन
समग्र ज्ञान का केन्द्र है भारत – डाॅ. बालमुकुंद पाण्डे्य

उदयपुर 20 मार्च / जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय के कुलपति सचिवालय के सभागार में भारत सरकार की इकाई भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) द्वारा प्रायोजित अनुसंधान पद्धति पर आयोजित दस दिवसीय पाठ्यक्रम के समापन सत्र के मुख्य वक्ता इतिहास संकलन समिति के राष्ट्रीय संगठन मंत्री  डाॅ. बालमुकुंद पाण्डे्य ने कहा कि वास्तविक मायने में शोध भारतीय दर्शन व संस्कृति से ओतप्रोत हो। भारत को अनुसंधान का देश बताते हुए कहा कि समग्र ज्ञान परम्परा राष्ट्र की धरोहर है तथा भारत देश गुरूकुल परम्परा का द्योतक होने के साथ साथ ऋषि परम्परा देश की आत्मा व उसे चरितार्थ करते हुए ऋषि मंत्र दृष्टारः सुक्ति की विस्तृत रूप से विवेचना की। उन्होने पर्यावरण में होने वाले प्रभाव के अन्तर्गत  विश्व के सभी प्राणियों का योगदान बताया। भारतीय दर्शन व विचारों से युक्त शोध पर जोर दिया। शोध के लिए प्राईमरी स्त्रोत पर जोर देते हुए, उसके साथ सैकण्डरी सोर्स का अन्तर सम्बंध जोड़ कर उसके सफलतम क्रियान्वयन पर शोधार्थियों को प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि विद्या  का अर्थ सिर्फ नौकरी प्राप्त करना रह गया है। ज्ञान किताबों से नहीं अनुभूति से आता है। भारतीन चिंतन परम्परा से ही वास्तविक शोध हो सकता है। समग्र ज्ञान का केन्द्र रहा है भारत। उन्होंने कहा कि रिसर्च नही, सर्च की परम्परा शुरू करने की जरूरत है।

प्रारंभ में कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने अतिथियों का स्वागत परिचय कराते हुए कहा कि आज के परिप्रेक्ष्य में मात्रात्मक अनुसंधान व गुणात्मक अनुसंधान को राष्ट्र हित में होना परम आवश्यक है तभी राष्ट्रवादी विचारधारा व विकास की संकल्पना सार्थक सिद्ध होगी। उन्होंने राष्ट्र धरोहर के रूप में वैदिक ज्ञान, परम्परा के क्षेत्र में विस्तृत व सारगर्भित शोध की आवश्यकता जताई। भारत वास्तविक मायने में शोध के लिए एक मात्र सही स्थान है जहाॅ समूचे विश्व से आकर विभिन्न क्षेत्रों में शोध कर नवीन ज्ञान की परम्परा को विकतिस कर रहे हैं।  उन्होंने शोध को केवल डिग्री के तौर पर नहीं वरन् वास्तविक ज्ञान के उद्देश्य से करने पर जोर दिया। वैज्ञानिक अनुसंधान में वैज्ञानिक विधि का सहारा लेते हुए जिज्ञासा का समाधान करने की कोशिश करते हुए नवीन वस्तुओें की खोज व पुरानी वस्तुओं व सिद्धांतों का पुनः परीक्षण जिससे नये तथ्य प्राप्त हो सकें, ऐसे शोध की आवश्यकता पर बल देते हुए सभी शोधार्थियों को प्रेरित किया।

दिल्ली विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष डाॅ. योगानंद शास्त्री ने विश्व में विद्यमान भारतीय संस्कृति की संकल्पना को विभिन्न माध्यमों से चरितार्थ करते हुए कहा कि भारत का इतिहास गौरवशाली रहा। भाषा को जीवन में महत्वपूर्ण स्थान देने के साथ-साथ ब्राहमी,  खरोस्टी आदि अन्य लिपियों की विवेचना करते हुए मातृ भाषा राष्ट्र भाषा रूपी शक्तिशाली समृद्ध भाषा संस्कृत और उसमें निहित विस्तृत ज्ञान, ऋषि परम्परा युक्त विभिन्न ग्रंथ जिनमें वेद, कुरान, गीता, महाभारत आदि सम्मिलित हैं, उनकी विवेचना के साथ सार गर्भित शोध पर बल दिया।
श्रीगोविन्द गुरू विवि गोधरा गुजरात के कुलपति प्रो. प्रताप सिंह चैहान ने नये ज्ञान का निर्माण या मौजुदा ज्ञान का उपयोग नये रचनात्मक तरीके से उपयोग के रूप में परिभाषित किया जिससे नयी अवधारणा पद्धति एवं समझ को क्रियान्वित किया जा सके। सभी शोधार्थियों को दस दिवसीय अनुसंधान पद्धति पाठ्यक्रम में सम्मिलित होने की बधाई देते हुए शोध के माध्यम से समाज को एक नई दिशा देने का आव्हान किया।

कोर्डिनेटर डाॅ. चन्द्रेश छतलानी ने बताया कि 10 दिससीय कार्यशाला में देश भर के 32 आॅफलाईन व 27 आॅनलाईन प्रतिभागियों ने भाग लिया। 30 से अधिक सत्रों में शोध की विधी व नवीनतम टूल्स की जानकारी प्रदान की गई। नयी शिक्षा नीति 2020 के अनुसार भारतीय पुरातन ज्ञान व विकसित भारत हेतु शोध पर विशेष व्याख्यानों का आयोजन हुआ।  इस अवसर पर कार्यशाला में भाग लेने वाले स्कोलर्स को अतिथियोें द्वारा प्रमाण वितरित किए गए।

संचालन डाॅ. यज्ञ आमेटा ने किया जबकि आभार डाॅ. चन्द्रेश छतलानी ने जताया।

समापन सत्र में डाॅ. चन्द्रेश छतलानी, डॉ. संजय चैधरी, डॉ. प्रदीप सिंह शक्तावत, डाॅ. शिल्पा कंठालिया,  निजी सचिव केके कुमावत, डॉ. यज्ञ आमेटा, डॉ. ललित सालवी, विकास डांगी, युवराज सिंह सारंगदेवोत सहित पूरे देश से आए हुए रिसर्च स्कॉलर्स उपस्थित थे।

By Udaipurviews

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