ख्यातनाम संस्कृतिकर्मी विलास बोले, जो देखा उससे मन हो खिन्न
उदयपुर। देश के ख्यातनाम संस्कृतिकर्मी, मूकाभिनय के लिए राष्ट्रपति सहित कई पुरस्कार पा चुके रंगकर्मी विलास जानवे ने उदयपुर के चल रहे शिल्पग्राम उत्सव में चल रहे प्रस्तुतियों की खिचड़ी तथा घालमेल को लेकर चिंता जताई है। उनकी राय है कि शिल्पग्राम उत्सव को मौलिक ही बनाए रखें तो ज्यादा बेहतर होगा।
जानवे का कहना है कि पहली बार शिल्पग्राम के मुक्तांगन में लोक और जनजातीय नृत्यों की दुर्दशा देखकर उनका मन खिन्न हो गया। उनका मत है कि शिल्पग्राम उत्सव का उद्देश्य हमारी समृद्ध देहाती लोक और जनजातीय प्रदर्शन कलाओं और शिल्प को प्रोत्साहित करना है। उनका संरक्षण और संवर्धन करना है। शिल्पग्राम का मंच भारत के कोने—कोने में पुष्पित और पल्लवित संस्कृति को एक मंच पर लाता है, ताकि लोगों को अलग—अलग राज्यों की ग्रामीण और जनजातीय संस्कृति को एक पटल पर देखने का अवसर मिल पाए। मुक्ताकाशी दीर्घा में बैठे लोग अलग—अलग राज्यों के संगीत नृत्यों में अपनापन पायें। वह कर्नाटक, ओडिशा, गुजरात और मणिपुर जैसे कई राज्यों के नृत्य-गीत-संगीत की रम्य प्रस्तुतियों को देख कर आनंदित हो सकें और साथ ही अपनी देशज विरासत पर गर्व कर सकें। दूसरे राज्यों की संस्कृति और प्रकृति को देखने की इच्छा जागृत हो और उस राज्य का दौरा करने का मानस बनायें और एक भारत—श्रेष्ठ भारत की कल्पना को साकार कर पाएं।
फ्यूजन की जगह कनफ्यूजन
जानवे ने कहा कि शिल्पग्राम उत्सव के उद्घाटन समारोह में दिल्ली से आई कोरियोग्रागर मैत्रई पहाडी ने ‘झंकार’ नामक कार्यक्रम निर्देशित किया, जिसमें मणिपुरी पुंग ढोल ढोलक चोलम, राजस्थान के चरी और कालबेलिया, महाराष्ट्र के कोली, कर्नाटक का ढोल्लू कुनीथा और अन्य राज्यों के संगीत और नृत्यों के साथ समवेत प्रस्तुति दी। किन्तु इस घालमेल ने प्रस्तुतियों की खिचडी बन गयी। फ्यूजन की जगह कनफ्यूजन हो गया। तीन सौ कलाकारों की आवाजाही ने मंच हमेशा भरा रखने के क्रम में कलाकारों की भीड़ ही कर दी। मंच पर रोशनी का प्रबंधन भी बड़ा विचित्र था। इतनी सारी लाइट होने के बावजूद भी कलाकारों पर रोशनी का अभाव था। वैसे भी हमारे लोक और जनजातीय नृत्यों के कलाकारों की वेशभूषा और रंगभूषा इतनी रंगबिरंगी और खुशनुमा होती है, कि उन पर लाल नीली हरी रोशनी डालने की आवश्यकता ही नहीं होती। उनका सौंदर्य तो सीधी रोशनी में स्वतः निखर उठता है। साधनों की बहुतायतता किसी कृति को सौन्दर्य प्रदान नहीं करती। कोरियोग्राफर ने संगीत और गीतों को चुनाव भी ठीक से नहीं किया। कालबेलिया(राजस्थान), कोली (महाराष्ट्र) और देखनी(गोवा) के नृत्य के गायन ने काफी निराश किया। चरी नृत्य के वाद्य अपूर्ण थे, पारम्परिक चरी नृत्य में गायन नहीं होता। राठवा(गुजरात) का ढोल भी मौलिक नहीं था। रोशनी के चकाचोंध से दर्शकों को विस्मित करने के स्थान पर मौलिकता और सौन्दर्य बोध पर ध्यान देना अपेक्षित था। झंकार के फिनाले में सांगीतिक मिठास पर कर्कश शोर हावी हो गया था। संस्कृति में रुचि लेने वाले दर्शक यह कयास लगाते रहे कि कौनसा नृत्य किस राज्य का है। यद्दपि दूसरे दिन स्क्रीन पर इस की जानकारी दी गई। दूसरी शाम पंजाबी सूफी की प्रस्तुति के बाद लोक कलाकारों को मंच पर उतारा गया, जिसके चलते कलाकारों को काफ़ी इंतज़ार करना पड़ा |
उनका कहना है कि हमारी आज के पीढ़ी को वही याद रहेगा जो सांस्कृतिक केंद्र, संस्कृति के नाम पर परोसेगा। अन्य लोकप्रिय कलाओं को मौक़ा देने वाले कई और भी संस्थान और इवेंट मेनेजमेंट कम्पनियाँ हैं। शिल्पग्राम उत्सव एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक पर्व है, जिसमें अधिक से अधिक बल देशज, मौलिक लोक और जनजातीय कार्यक्रमों को दिया जाना चाहिए। देश की अखण्डता और भारत को श्रेष्ठ बनाने में हमारी लोक संस्कृति का बड़ा योग दान है। उन्होंने आशा जताई कि आने वाले दिनों में हमारे देशज कलाकार योग्य सम्मान पाएंगे।
शिल्पग्राम उत्सव को बनाए रखें मौलिक
