राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा आयोजित साहित्यकार-कवि संगम में पहुंचे कलमकार

परदेशी की 100वीं जयंती पर विविध आयोजन
परदेशी पार्क में परदेशी की प्रतिमा पर माल्यार्पण से कार्यक्रमों की हुई शुरुआत

प्रतापगढ़ 27 जुलाई। देश के ख्यातनाम साहित्यकार मन्नालाल शर्मा ‘परदेशी’ की 100वीं जयंती के अवसर पर विविध कार्यक्रम हुए। प्रातः परदेशी पार्क में लेखकों, कवियों और अन्य साहित्यप्रेमियों ने परदेशी पार्क पहुँच कर परदेशी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें याद किया। इसके पश्चात राज्य सरकार की राजस्थान साहित्य अकादमी एवं मयूर संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में शाम 4 बजे से रात्रि 11 बजे तक पेंशनर्स समाज भवन सभागार में साहित्यकार-कवि संगम एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ।
कार्यक्रम में राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से कवि पहुंचे और अपने काव्य पाठ से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम का संचालन कवि सुरेन्द्र ‘सुमन’ और कवि कुँवर प्रताप ने किया। स्वागत उदभोदन प्रवेश परदेशी ने दिया और आभार प्रकट सुधीर वोरा ने किया। मंच पर मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी प्रह्लाद पारीक, पूर्व जिला शिक्षा अधिकारी एवं वरिष्ठ लेखक योगेश जानी चित्तौड़गढ़, कवि हरीश व्यास, अखिल भारतीय साहित्य परिषद अध्यक्ष सुरेश ‘सूरज’, भारतीय साहित्य उत्थान परिषद अध्यक्ष भैरु सुनार, इतिहासकार मदन वैष्णव, गीतकार चांदमल चंद्रेश उपस्थित रहे। कार्यक्रम में पहुंचे कवियों एवं श्रोताओं को राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा वर्ष 1995 में परदेशी के जीवन पर प्रकाशित पुस्तक ‘हमारे पुरोधा’ की एक-एक प्रति और एक मोमेंटों भेंट किया गया।

मुख्यमंत्री के बधाई संदेश का किया वाचन
कार्यक्रम में चन्द्रप्रकाश द्विवेदी ने मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत द्वारा परदेशी की 100वीं जयंती पर भेजे गए संदेश का पत्र वाचन किया। मुख्यमंत्री द्वारा प्रेषित संदेश में लिखा है कि उन्हें यह जानकर प्रसन्नता है कि राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर और मयूर संस्थान के तत्वावधान में देश के प्रसिद्ध साहित्यकार स्वर्गीय श्री मन्नालाल शर्मा “परदेशी” की 100वीं जयंती पर 26 जुलाई 2023 को प्रतापगढ़ में साहित्यकार-कवि संगम और काव्य गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है।
प्रदेश के साहित्यिक पुरोधा परदेशी जी की जयंती पर ऐसे सारस्वत अनुष्ठान अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। इससे उनके विभिन्न विधाओं में साहित्य सृजन और संघर्ष पूर्ण जीवन के विविध पहलुओं से नई पीढ़ी को प्रेरणा मिलेगी। आशा है परदेशी की 100वीं जयंती पर होने वाले साहित्यिक अनुष्ठान महान शब्द शिल्पी ‘परदेशी’ के बहुआयामी व्यक्तित्व और कृतित्व को व्यापक बनाने की दृष्टि से सार्थक सिद्ध होंगे। उन्होंने संदेश में स्मृतिशेष परदेशी को श्रद्धापूर्वक स्मरण और नमन करते हुए उनकी 100वीं जयंती पर सभी साहित्यिक कार्यक्रमों की सफलता के लिए अपनी शुभकामनाएं दी है।

कवियों ने अपने काव्य-पाठ से बांधा समां
साहित्यकार-कवि संगम एवं काव्य गोष्ठी में दादू प्रजापति गीत ॠषी मनासा, आशु कवि भैरू सुनार, नरेन्द्र व्यास व्यंग्यकार नीमच, जगदीश बैरागी मनासा, बलवंत सिंह हाड़ा बनी, योगेश शर्मा मोरवन, तेजशंकर राठौर, तेजसिंह सिसोदिया रतलाम, मुकेश आनंद भावसार, मोहित गोस्वामी, धनपाल धमाका, हरिओम हरपल, शौकीन जणवा, राजेश रणबांकुरा, कैलाश राव रसिक, मोहन सिंधी, मनोज जैन, मदन वैष्णव, हरीश व्यास, चांदमल चंदू, सुरेश सूरज, राजेन्द्र जोशी, श्याम सोनी, राजेन्द्र वैष्णव, मनोहर दास बैरागी, चन्द्रशेखर मेहता, जितेन्द्र टेलर, विजय विद्रोही, लोकेन्द्र सिंह, कमलेश नागर, चन्द्रप्रकाश द्विवेदी, भोमसिंह, शैलेन्द्र शैलू, सुनिल राठौड, विक्की सिंह, चेतन शास्त्री मंदसौर, मनीष त्रिवेदी, रामनिवास गायरी आदि ने काव्य पाठ करते हुए सभी को मोह लिया।

परदेशी की ये प्रमुख कृतियाँ रही चर्चा में
परदेशी के प्रमुख उपन्यासों में चट्टानें, पाप की पुजारिन, न्याय के सींग, कच्ची धूप, दूध के बादल, औरत, रात और रोटी, भगवान बुद्घ की आत्मकथा, औरत एक : चेहरे हजार, बड़ी मछली : छोटी मछली, जय महाकाल, त्याग का देवता, सपनों की जंजीरें, मैला सपना, जय एकलिंग, कुवारी किरण, जयगढ़ का जोगी, आत्मसिद्धा, काला सोना, मोम की पुतली, सिंदूर की हथकडिय़ां आदि का नाम शुमार है। ऐसे ही उन्होंने कई कहानी संग्रह जैसे चंपा के फूल, संदेह का सिंदूर, बंद कमरा, राजस्थान के शौर्य एवं पराक्रम की कहानियां, खातू रावत और अन्य कहानियां, विश्वयुद्ध की रोमांचकारी कहानियां आदि लिखे।
उनके कविता संग्रह चित्तौड़ काव्य खंड, बादल, धरती माता, मदालसा, प्यार, रक्तदान, जयहिंद, कश्मीर को छोड़ दो, वातायन, परदेशी के गीत, लाल तारा, हंसिया, हथौड़ा और लेखनी, 42 के बाद का वर्ग संघर्ष, चालीस करोड़, परिंदा, पूर्व-अपूर्व आदि भी चर्चित रहे। ऐसे ही नाटक कल्पना, जनता की जीत, धरती का सिंगार एवं राजनीति विषयक पुस्तकें एशिया की राजनीति, कश्मीर का सवाल, दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावाद क्या है? आदि बहुचर्चित रहीं। बाल साहित्य में भी परदेशी ने खूब लिखा और प्रमुख बाल साहित्य पुस्तकों में सपनों के विधाता, सौदागर सुंदर, डॉ. अल्बर्ट स्वीत्ज़र, गुजरात की लोककथाएं, गढ़बंका और रणबंका, भारत की लोककथाएं, सोए आलसी की आंख आदि की रचना की।
ऐसे ही उनके लेख और निबंध संग्रह अर्जन और सर्जन, बेंजामिन फ्रैंकलिन, कोनटिकी, तूफान, हेनरी फोर्ड, व्यापार के नव क्षितिज आदि भी खूब पढे गए। उन्होंने सेठ जमनालाल बजाज को गांधीजी के पत्र का हरिभाऊ उपाध्याय के साथ संपादन वर्ष 1953 में किया।
By Udaipurviews

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