उदयपुर। स्कूली और कॉलेज शिक्षा में अब तक दिल्ली केन्द्रित इतिहास ही पढ़ाया जाता रहा है। मुगल भारतीय इतिहास का पर्याय नहीं है। दिल्ली के इतिहास से अधिक विशाल है भारत का इतिहास। इसलिए दिल्ली केन्द्रित इतिहास की बजाय समाज केन्द्रित इतिहास पढ़ाया जाना उचित है। यह बात शिक्षाविद और गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डाॅ. बीपी. शर्मा ने एनसीईआरटी की पुस्तकों पर उठ रहे विवाद को लेकर उदयपुर में आयोजित चर्चा में कही।
उन्होंने कहा कि जैसे ही दिल्ली केन्द्रित इतिहास राष्ट्र केन्द्रित होता है प्रताप जैसे नायकों का पराक्रम स्थापित हो जाता है। वैसे भी वर्तमान इतिहास के 9वीं से 12वीं तक की पुस्तकों को राजनीतिक इतिहास से अधिक सांस्कृतिक इतिहास केन्द्रित किया गया। इतिहासविद् डाॅ. विवेक भटनागर का कहना है कि एनसीईआरटी की कक्षा 12 की ‘भारतीय इतिहास के कुछ विषय’ पुस्तक तीन भागों में प्रकाशित हैं। इसके दूसरे हिस्से के अध्याय चार में कृषि समाज और मुगल सम्राज्य का अध्याय है। इसमें मुगलकालीन समाज, संस्कृति और अर्थव्यवस्था के साथ ही प्रशासन भी वर्णित है। ऐसे में मुगल के अध्याय को हटाने का प्रश्न ही नहीं उठता है। साथ ही मध्यकालीन भारत में दक्षिण भारत की संस्कृति और राजनीति पर ‘एक साम्राज्य की राजधानीः विजयनगर’ अध्याय से दक्षिण भारत के इस्लामिक इतिहास और उसकी संस्कृति का दिखाने का प्रयास किया गया है। इतिहास संकलन समिति के जिला मंत्री चैनशंकर दशोरा ने बताया कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) ने कक्षा 12वीं की इतिहास की पुस्तक का पुनःलेखन कर नए सिरे से प्रस्तुत किया। इसके बाद से इस बात पर विवाद छिड़ गया है कि पुस्तकों से किताबों से मुगल साम्राज्य से जुड़े अध्यायों को हटा दिया गया है या नहीं रखा गया है। इसके अतिरिक्त भी अन्य परिर्वतन किए गए हैं, जिन पर विवाद हो रहा है। चर्चा में शामिल कोटा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डाॅ. एमएल कालरा ने कहा कि मुगल सिर्फ दो सौ वर्ष तक ही भारत में प्रभावी रहे। ऐसे में सिर्फ उनका इतिहास ही पढ़ाया जाए, ऐसी हठ भी ठीक नहीं है। अगर कोई पूर्व में गलती हुई है तो उसका अंशांकन किया जाना स्वाभाविक प्रक्रिया है।
वरिष्ठ इतिहासकार डाॅ. एम.पी. जैन ने कहा कि भारत में सत्ता के केन्द्र प्रत्येक काल अवधि में अनेक रहे।
दिल्ली केन्द्रित इतिहास की बजाय समाज केन्द्रित इतिहास पढ़ाया जाना उचित
