53 वीं तिलक आसन व्याख्यानमाला – भारतीय ज्ञान प्रणाली एवं संस्कृति विषय पर व्याख्यानमाला का हुआ आयेाजन
भारतीय ज्ञान परम्परा सर्वकालिक सार्वभौमिक और सर्वव्यापी – प्रो. सारंगदेवोत
उदयपुर 11 अक्टुबर / भारत मात्र एक भौगोलिक प्रदेश का नाम मात्र नहीं वरन चेतन से जागृत देह के रूप से पृथक आत्म स्वरूप से स्थित वह राष्ट्र है जहॉ सद्चित आनंद की अनुभूति होती है वहीं भारत है। भारत की एकता उसकी विविधता से बनती है। यही विविधता सनातन काल से वर्तमान तक भारत को भारत बनाए रखे हैं भारत की ज्ञान परंपरा और संस्कृति सदैव विश्व की पथ प्रदर्शक रही है। भारत के इस सामर्थ्य के पीछे वह ज्ञान है जिसमें विद्या विज्ञान चिंतन दर्शन सभी को पर्याप्त स्थान दिया गया है जिसकी परिणीति विश्व के समक्ष अद्वितीय मौलिक ज्ञान के रूप में सामने आई है यह विचार राजस्थान विद्यापीठ के संघटक लोकमान्य तिलक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय द्वारा भारतीय ज्ञान प्रणाली एवं संस्कृति विषय पर आयोजित 53वीं व्याख्यानमाला में बतौर मुख्य वक्ता कही। पाण्ड्ेय ने भारतीय ज्ञान प्रणाली और संस्कृति के आपसी समन्वय सामंजस्य और उनके सकारात्मक परिणाम पर बातचीत करते हुए वर्तमान में इसकी प्रासंगिकता और आवश्यकता दोनों पर ही प्रकाश डाला साथ ही साथ वैदिक कालीन परंपराओं से लेकर त्रेता युग द्वापर युग और वर्तमान में भारतीय ज्ञान के स्वरूप और उसके साजन पर भी विचार व्यक्त किया। वर्तमान पीढ़ी को भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति से जोड़ने और मौलिक ज्ञान नवाचार अतींद्रिय ज्ञान एकांत चिंतन की महता को रेखांकित किया साथ ही साथ इसको अपने और इसको बढ़ावा देने के लिए किए जाने वाले प्रयासों पर भी प्रमुखता से बात रखी।
अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपराएं जो किसी कारणवश भुलाई जा चुकी है उन्हें पुनः स्थापित किये जाने की आवश्यकता है। हमें शिक्षा से विद्या की ओर जाकर प्राचीन ज्ञान और सनातनी ज्ञान परंपराओं तथा वेद वेदांत उनके रचना प्रकारों और पांच तत्वों की बातों को अपनाना होगा। भारतीय ज्ञान परंपरा सार्वभौमिक सर्वकालिक और सर्वव्यापकता लिए हुए हैं। इसका प्रमुख कारण इसका पुरातन से नूतन स्वरूप बनाए रखने की क्षमता है जो हमें भीतरी चेतन ऊर्जा उत्साह ऊष्मा जागृत करके उपर से सूक्ष्म की ओर और रहस्यतम ज्ञान के मार्ग की ओर प्रशस्त करती है।
विशिष्ट अतिथि गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय की डॉ. प्रेमलता देवी ने वर्तमान समाज में व्याप्त नकारात्मकता और आधुनिक ज्ञान परंपरा पर अपने विचार व्यक्त किया तथा उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली में गुरु की महत्व बताते हुए कहा कि एक और माता-पिता जहां जीव को शरीर प्रदान करता है वही गुरु एक शिष्य में आत्मा का रोपण करता है हमें इन्हीं भारतीय मूल्यों और सनातन पद्धतियों को अपनाते हुए श्रेष्ठ शिक्षक निर्माण और श्रेष्ठ पीढ़ी निर्माण हेतु पुरातन सांस्कृतिक मूल्य और जीवन शैली को अपनाने की बात कही।
प्रारंभ में प्राचार्य प्रो. सरोज गर्ग ने अतिथियोें का स्वागत करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति की आवश्यकता नई शिक्षा नीति के माध्यम से क्रियान्वयन और नई पीढ़ी में भारतीय मूल्य के विचार रोपण और पोषण दोनों में ही शिक्षक के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किया।
इस अवसर पर डॉ. रचना राठौड़, डॉ. सुनिता मुर्डिया, डॉ. बलिदान जैन, डॉ. अमी राठौड़ सहित अकादमिक, गैर अकादमिक कार्यकर्ता एवं विधार्थी उपस्थित थे।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. हरीश चौबीस ने किया।
मौलिक ज्ञान नवाचार और चिंतन का आधार है भारतीय ज्ञान परम्परा – डॉ. ओपी पाण्डे्य
