हरियाली अमावस्या मेला: प्रकृति, परंपरा और नारी सम्मान का अनुपम संगम
उदयपुर। मेवाड़ की सांस्कृतिक पहचान बने हरियाली अमावस्या मेले का उदयपुर में भव्य आयोजन हुआ, जो न सिर्फ प्रकृति और परंपरा का उत्सव है, बल्कि महिला सशक्तिकरण का भी अद्भुत उदाहरण है। श्रावण मास की अमावस्या को दो दिवसीय इस मेले का आयोजन नगर निगम द्वारा किया जाता है, जो देशभर से हजारों लोगों को आकर्षित करता है।
विशेष बात यह है कि मेला दो दिन चलता है—पहला दिन सभी के लिए खुला होता है, जबकि दूसरे दिन केवल महिलाओं को प्रवेश दिया जाता है। संभवतः यह दुनिया का इकलौता लोक मेला है जो पूर्णतः महिलाओं को समर्पित होता है। यह पहल महाराणा फतहसिंह की रानी चावड़ीजी की इच्छा से प्रारंभ हुई थी।
इतिहास की गलियों से…
फतहसागर झील के निर्माण के बाद 1898 में इस मेले की शुरुआत हुई। लोक संस्कृति के विद्वान डॉ. श्रीकृष्ण जुगनु बताते हैं कि महाराणा फतहसिंह जब तालाब के पूर्ण होने पर दरबारियों के कहने पर फतहसागर की पाल पर आए, तो वहीं से मेले की परंपरा शुरू हुई। मेले की सूचना शहरभर में मुनादी के ज़रिए दी गई और लोगों में दो-दो आनी बांटी गई, जिससे मालपुए खाकर उत्सव का आनंद उठाया गया।
रंग-रंगीला उत्सव, उत्सव में उमंग
मेले में खेल-खिलौने, सौंदर्य प्रसाधन, पारंपरिक वस्त्र, घर-रसोई की वस्तुएं और मनोरंजन के झूले प्रमुख आकर्षण रहे। सहेलियों की बाड़ी से लेकर फतहसागर झील की पाल तक लोगों का जनसैलाब उमड़ा। ग्रामीण अंचलों से आए मेलार्थियों की रंगबिरंगी पारंपरिक वेशभूषा, खिलखिलाते चेहरे और रिमझिम बारिश ने माहौल को और अधिक रमणीय बना दिया।
सुरक्षा व सुविधा का रहा पूरा इंतजाम
भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा, ट्रैफिक कंट्रोल, दमकल और मेडिकल टीमों की पुख्ता व्यवस्था की। मेला क्षेत्र में वाहनों का प्रवेश प्रतिबंधित रहा, जिससे पैदल चलने वालों को सहजता रही।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण
हरियाली अमावस्या केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का संदेशवाहक पर्व है। पेड़-पौधों की पूजा कर प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है। यह पर्व हमें धरती को हरा-भरा रखने और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने का संकल्प देता है, जो आज के समय में और अधिक प्रासंगिक है।
नारी शक्ति को समर्पित अनूठा मेला
दूसरे दिन केवल महिलाओं के लिए आरक्षित इस मेले में महिला सशक्तिकरण की झलक देखने को मिलती है। यह न सिर्फ एक परंपरा है, बल्कि सम्मान और सहभागिता का प्रतीक भी बन चुका है।

