देश विदेश के 250 से अधिक प्रतिभागी ले रहे है भाग
अहिंसा, धर्म और संस्कृति ही हैं शांति के शाश्वत स्तंभः – प्रो. सारंगदेवोत
योग, मंत्र और पारिवारिक संबंधों के पोषण से शांति का स्थायित्व संभव – प्रो. सुनिता मिश्रा
उदयपुर 25 अप्रेल। राजस्थान विद्यापीठ के संघट लोकमान्य तिलक शिक्षक प्रशिक्षण महाविद्यालय, डबोक में ‘शांति शिक्षा-विचार एवं कर्म’ विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ शुक्रवार को हुआ, जिसकी शुरुआत मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुई।
कुलपति कर्नल प्रो. शिवसिंह सारंगदेवोत ने कहा कि “शांति का आरंभ आत्म से होता है। जब मनुष्य अपने अंतर्मन में संतुलन और सद्भाव स्थापित करता है, तभी वह बाह्य जगत में शांति का संवाहक बनता है।” उन्होंने कहा कि भारत की आत्मा धर्म में बसती है और धर्म का परम लक्ष्य शांति की स्थापना है। उन्होंने रामधारीसिंह दिनकर की पंक्तियों का उल्लेख करते हुए कहा कि “जब भी कोई मनुष्य अपने पथ या संस्कृति से गिरता है, शांति चुपके से अपना आसन छोड़ देती है।” उन्होंने कहा कि अहिंसा भारतीय दर्शन की मूल अवधारणा है और यह हमारे वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, योगशास्त्र और जीवन पद्धति में विद्यमान है। “शांति किसी सत्ता द्वारा थोपी नहीं जा सकती, उसे साधना पड़ता है, अर्जित करना होता है।” उन्होंने बताया कि परिवार मूल्य निर्माण की पहली पाठशाला है, जहां बच्चा प्रेम, करुणा और विश्वास जैसे जीवनमूल्य सीखता है। उन्होंने कहा कि बौद्धिक स्तर पर बुद्धि (आईक्यू) समस्या सुलझाने में सहायक होती है, भावनात्मक बौद्धिकता (ईक्यू) जीवन के प्रति समझ विकसित करती है और आध्यात्मिक बौद्धिकता (एसक्यू) हमें जीवन का अर्थ समझाती है। उन्होंने शांति मंत्र के तीन बार उच्चारण की परंपरा का आध्यात्मिक विश्लेषण करते हुए कहा कि यह शरीर, मन और आत्मा को संतुलित करने की विधि है। वेदों, उपनिषदों और भारतीय परंपरा के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि भारत सदा से विश्वशांति का अग्रदूत रहा है। उन्होंने अपने उद्बोधन की शुरुआत शांति प्रार्थना से की और कहा कि शांति को अपने कर्मों में उतारना ही उसका वास्तविक अभ्यास है। यही उपचार और सामंजस्य का माध्यम है। “सत्य और ज्ञान से ही मन की शांति प्राप्त होती है और वही जीवन को आनंदपूर्ण बनाती है।”
सम्मेलन के मुख्य अतिथि मोजाम्बिक के प्रसिद्ध पर्यावरणविद और शिक्षाविद् प्रो. बेसेलियो ने कहा कि शांति की सबसे बड़ी आवश्यकता आज के शैक्षणिक परिवेश में है। उन्होंने केवल युद्ध की अनुपस्थिति को शांति नहीं माना जा सकता, बल्कि आत्मिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संतुलन भी आवश्यक है। उन्होंने मांसाहार को अशांति का कारण बताते हुए इसे लालच का पोषक कहा, न कि आवश्यकता। “शिक्षा का केन्द्र बिंदु मानवता होना चाहिए। शांति आधारित शिक्षा को जीवन की मूलभूत आवश्यकता के रूप में घोषित किया जाना चाहिए।”
सुखाडिया विवि की कुलगुरू प्रो. सुनीता मिश्रा ने विविधता में एकता को भारत की विशेषता बताते हुए कहा कि “मनुष्य ही समस्त शक्ति का केन्द्र है। अहिंसा शांति की जड़ है और आंतरिक शांति से ही वैश्विक समरसता की नींव रखी जा सकती है।” उन्होंने कहा कि शिक्षा प्रणाली को अधिक संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है ताकि बढ़ती चुनौतियों का उत्तर शांतिपूर्ण रूप में दिया जा सके। योग, मंत्र और पारिवारिक संबंधों के पोषण से शांति का स्थायित्व संभव है।
कुलाधिपति भंवरलाल गुर्जर ने अपने उद्बोधन में शांति स्थापना में नैतिक शिक्षा की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि शांति केवल सैद्धांतिक विषय नहीं है, इसे जीवन में व्यावहारिक रूप में उतारना आवश्यक है। “परिवार और शिक्षा में यदि संस्कारहीनता आ जाए तो वहीं से आतंकवाद और अशांति का जन्म होता है।” उन्होंने सीमित संसाधनों के भीतर मानवीय मूल्यों के विकास की आवश्यकता पर बल दिया।
कनाडा से ऑनलाइन माध्यम से जुड़ीं प्रसिद्ध गांधीवादी शिक्षाविद डॉ. जिली ने अपने वक्तव्य में गांधीवादी मूल्यों को शांति स्थापना का केंद्र बताया। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली ने स्वार्थ और लालच को बढ़ावा दिया, जो अशांति के मूल कारण हैं। गांधीवादी शिक्षा पद्धति को अपनाकर ही हम पारिस्थितिकी पर आधारित करुणामूलक व्यवस्था की स्थापना कर सकते हैं, जो पूंजीवादी शोषणकारी ढांचे का विकल्प हो।
प्रो. राणाप्रताप सिंह ने कहा कि बाह्य शांति को प्राप्त करना अपेक्षाकृत सरल है क्योंकि उसमें व्यक्ति के स्वार्थ सम्मिलित होते हैं, लेकिन आत्मिक शांति प्राप्त करने के लिए सकारात्मक चिंतन और करुणा से परिपूर्ण दृष्टिकोण आवश्यक है। उन्होंने कहा कि शिक्षा प्रणाली में शांति स्थापनार्थ पाठ्यचर्या को अद्यतन करना अत्यंत आवश्यक है। “शांति के संस्कार यदि बचपन से दिए जाएं तो वही वैश्विक शांति का आधार बन सकते हैं।”
प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए शिक्षा संकाय की अधिष्ठाता प्रो. सरोज गर्ग ने कहा कि शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान न केवल ज्ञान का केन्द्र होते हैं, बल्कि वे शांति स्थापना के भी स्तंभ हैं। उन्होंने बताया कि किस प्रकार इन संस्थानों से प्रशिक्षित शिक्षक समाज में मूल्यपरक चेतना और अहिंसा की भावना का संचार करते हैं। दो अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी में 6 अलग अलग देशों और देश के 14 राज्यों के करीब 250 से अधिक प्रतिभागी भाग ले रहे है और 100 से अधिक शोध पत्रों का वाचन शोधार्थियों द्वारा किया जायेगा। दो दिनों में सह विषय शांति और अहिंसा, अच्छे स्वास्थ्य और शांति की स्थापना में दर्शन की भूमिका, सांस्कृतिक विविधता और शांति, शांति और भारतीय ज्ञान,सार्वभौमिक शांति को बढ़ावा देने में प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च शिक्षा की जिम्मेदारियाँ, पारिवारिक मूल्यों की विरासत विषयों पर चर्चा होगी।
सम्मेलन का संचालन डॉ. अमी राठौड़, डॉ. हरीश चौबीसा ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रचना राठौड़ ने किया।
संगोष्ठी में कन्या महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. अपर्णा श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित पुस्तक विविध दृष्टिकोण की खोज करने वाला राजनीतिक दृष्टिकोण का विमोचन अतिथियों द्वारा किया गया।
समारेाह के अंत में पहलगाव में हुए आतंकी हमले में दिवंगतों के प्रति दो मिनिट का मोन रख, मोमबत्ती जला शांति की प्रार्थना की गई।
इस अवसर पर प्रो. एमपी शर्मा, प्रो. शशि चितौडा, प्रो. प्रभा वाजपेयी, प्रो. ए.के. मेहता, डॉ. मनीष सक्सेना, प्रो. गजेन्द्र माथुर, प्रो. आईजे माथुर, डॉ. सुनिता मुर्डिया, डॉ. अमिया गोस्वामी, डॉ. अमित दवे, डॉ. अमित बाहेती सहित विद्यापीठ के डीन डायरेक्टर एवं शोधार्थी उपस्थित थे।
विद्यापीठ में शांति शिक्षा-विचार एवं कर्म विषयक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ
