उदयपुर, 10 अगस्त। आदिवासीयों ने देश के इतिहास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन आज तक की सरकारों ने आदिवासीयों के साथ धोखा कर उन्हें लूटने का षड़यंत्र रचा, अब आदिवासी गुलाम नहीं है। आदिवासीयों को न्याय नहीं मिलने पर वह सरकार के प्रतिनिधियों को गांव में घुसने नहीं देंगे।
यह विचार आदिवासी जनाधिकार एका मंच के राज्य सचिव विमल भगोरा ने किसान और मजदूर संगठनों के देशव्यापी जेल भरो आंदोलन के अवसर पर गोगुन्दा के उप जिला कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन के दौरान सभा में व्यक्त किये। भगोरा ने कहा कि आदिवासी को इंसान माना जावे और उसे भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में मजबूत अवसर उपलब्ध करवाये जावे।
सभा को सम्बोधित करते हुए सीटू के उपाध्यक्ष गुमान सिंह राव ने कहा गोगुन्दा में भाजपा और कांग्रेस पार्टी ने बारी-बारी से यहां की जनता को लूटा है, लेकिन अब आदिवासियों ने हाथ में लाल झंडा ले लिया है जो अब अपने संगठन एवं एकता से अपनी तकदीर बदलेगा।
सभा में किसान सभा के तहसील अध्यक्ष देवाराम ने कहा कि सरकार द्वारा आदिवासी क्षेत्र में आज भी हजारों परिवार वनाधिकार कानून के तहत प्रस्तुत दावों का निस्तारण नहीं कर उनके साथ अन्याय किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि जिन दावों को बिना जांच खारिज किया गया, उनकी पुनः समीक्षा की जावे और किसी भी आदिवासी परिवार को उसके जमीन और घर से बेदखल नहीं किया जावे।
इस अवसर पर श्रवण, कान्हाराम, छगनलाल, बाबू, पुराराम आदि ने भी विचार व्यक्त किये। इधर झाड़ोल और कोटडा में भी आदिवासी जनाधिकार एका मंच और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त तत्वावधान में हजारों आदिवासीयों ने रैली निकाल कर उप जिला कलेक्टर कार्यालय पर प्रदर्शन कर वनाधिकार के पट्टे देने की मांग को लेकर पट्टों के लिए आवेदन तहसील कार्यालय में जमा करवाये।
किसान सभा के सचिव प्रभुलाल भगोरा ने कहा कि सदियों से आदिवासी जंगलो की रक्षा करते आये है। जंगल उसकी आजीविका, संस्कृति और पहचान का आधार है और इसी आधार पर वन अधिकार अधिनियम, 2006 बनाया गया, जिससे पात्र परिवारों को उनकी खेती की भूमि की कानूनी मान्यता मिल सके, लेकिन आज भी हजारों पात्र परिवार वन अधिकार पट्टे से वंचित है। उन्होंने कहा कि कई दावे बिना उचित कारण के खारिज कर दिये गये है। आदिवासियों को उनके वन भूमि कब्जे से बेदखली किये जाने को आये दिन सुनने को मिलता है। यह स्थिति कानून की भावना और सामाजिक न्याय के विरूद्ध है।
आदिवासी जनाधिकार एका मंच के जिला सचिव प्रेम पारगी ने कहा कि आदिवासी जंगल के दुश्मन नहीं, उसके सबसे बड़े संरक्षक है और उन्हें कानूनी अधिकार देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन सरकारों की नीति एवं प्रशासनिक लापरवाही व संवेदनहीनता के कारण आदिवासियों को उनका वैधानिक अधिकार नहीं मिल पाया।
किसान सभा के जिलाध्यक्ष जगदीश पारगी ने बताया कि राजस्थान में माह फरवरी 2026 तक वन अधिकार के पट्टों के लिए प्राप्त कुल 1,18,675 आवेदनों में से केवल 51,775 आवेदन ही स्वीकृत किये गये और 66,213 आवेदन अस्वीकृत कर दिये गये। उदयपुर जिले में 22,553 आवेदनों में से 12,758 स्वीकृत और 9,775 अस्वीकार कर दिये गये। वन अधिकार अधिनियम 2006 में कब्जेदार को 25 बीघा भूमि तक का पट्टा देने का प्रावधान है, लेकिन आदिवासी का कब्जा 10 से 20 बीघा पर कब्जा होने के बावजूद उसे पट्टा मात्र 2 से 4 बीघा तक का ही दिया गया है।
आदिवासी जनाधिकार एका मंच के जिलाध्यक्ष शंकर लाल पारगी ने कहा कि मनरेगा में पर्याप्त काम और समय पर मजदूरी सुनिश्चित की जावे और आदिवासी क्षेत्र में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया जावे।
इस अवसर पर दल्लाराम लउर, कमलाशंकर, बाबूलाल वडेरा, हाकरचंद खराडी, कैलाश बोदर, किशनलाल पारगी, लातूराम, नाथाराम नानालाल आदि ने भी विचार व्यक्त किये।
प्रदर्शन के बाद उप जिला कलेक्टर को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन देकर वन अधिकार के पट्टों के साथ बिलानाम भूमि का कब्जेधारियों को आवंटन करने, विधवा विकलांग एवं वृद्धावस्था के लिए दी जा रही पेंशन को अंगूठा निशानी/आंख की पुतली नहीं आने के आधार पर निरस्त नहीं करने और जिनकी पेंशन समाप्त कर दी गई है, उनकी पेंशन पुनः चालू करने, बिजली विेधेयक 2025 वापस लेकर बिजली का निजीकरण एवं स्मार्ट मीटर लगाना बंद करने, बीवीजीरामजी समाप्त कर मनरेगा में कार्य दिवस बढा कर 200 दिन किये जाए और प्रतिदिन मजदूरी 600/-रूपये करने, पेसा अधिनियम 1996 लागू करने, आदिवासी आबादी के अनुपात में सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण सुनिश्चित करने जनगणना 2011 के अनुसार वर्तमान में आदिवासी आबादी के राष्ट्रीय औसत के रूप में 8.6 प्रतिशत अनुमानित है, उसे आगामी जनगणना के आधार पर बढ़ाने, जल जंगल जमीन व खनीज पर आदिवासियों का अधिकार देने, टी.एस.पी. क्षेत्रों की भर्तियों पर आदिवासियों की जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने, प्रशासनिक सेवा में टी.एस.पी. क्षेत्र के आदिवासियों को पृथक से आरक्षण देने, आदिवासियों के विकास के लिए केन्द्र व राज्य सरकार जनसंख्या के अनुपात में बजट का आवंटन करने एवं अमेरिका के साथ कृषि क्षेत्र के बारे में की गई ट्रेड डील रद्द करने की मांग की गई।
