उदयपुर, 5 अगस्त। नारायण सेवा संस्थान में चल रही शिव कथा में संस्थान अध्यक्ष प्रशांत अग्रवाल ने शिव-सती प्रसंग के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, त्याग, करुणा और मानवता का संदेश दिया। कथा के दौरान उन्होंने कहा कि भगवान शिव का जीवन केवल आराधना का विषय नहीं, बल्कि लोकमंगल और समर्पण की प्रेरणा है।
दक्ष की यज्ञशाला में माता सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव वियोग में डूब गए। वे माता सती के निष्प्राण शरीर को कंधे पर लेकर विचरण करने लगे। उनकी पीड़ा और तांडव से सृष्टि का संतुलन प्रभावित होने लगा। देवताओं के आग्रह पर भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को स्पर्श कराया। शरीर के अंग पृथ्वी के विभिन्न स्थानों पर गिरे, जो कालांतर में 52 शक्तिपीठों के रूप में पूजित हुए। प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि शिव ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा को भी सृष्टि के कल्याण का माध्यम बना दिया। यही लोकमंगल की अनूठी भावना है।
इसके बाद भगवान शिव अपने धाम चले गए। कथा में तारकासुर के अत्याचार और उसके संहार के लिए शिव-पार्वती के मिलन की आवश्यकता का प्रसंग सुनाया गया। माता पार्वती के रूप में सती के पुनर्जन्म और उनकी कठोर तपस्या के वर्णन ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया और शिव-पार्वती का दिव्य विवाह संपन्न हुआ। इस प्रसंग के दौरान कथा स्थल शिव-पार्वती के जयकारों से गूंज उठा।
प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि शिव-पार्वती का विवाह हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम त्याग, तपस्या, विश्वास और समर्पण पर आधारित होता है। जीवन में परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, श्रद्धा और धैर्य से मार्ग प्रशस्त होता है।
कथा के दौरान दिव्यांग लाभार्थियों एवं उनके परिजनों से संवाद भी किया गया। कई लाभार्थी भक्ति में भावविभोर नजर आए। कथा ने श्रद्धालुओं को शिव भक्ति के साथ मानव सेवा, करुणा और परोपकार को जीवन का हिस्सा बनाने की प्रेरणा दी।
शिव-सती के वियोग से शिव-पार्वती विवाह तक, प्रशांत अग्रवाल ने सुनाया लोकमंगल का संदेश
