(पुण्यतिथि 5अप्रेल पर विशेष)
डॉ. विजय विप्लवी
राजस्थान की राजनीति में सिद्धांतनिष्ठ, संगठन-समर्पित, व्यापक जनसम्पर्क व जनाधारित नेताओं की जब भी चर्चा होगी, स्व. ललित किशोर चतुर्वेदी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाएगा। एक ओर कॉलेज सेवा के दौरान संघ से जुड़ाव के कारण बार-बार स्थानांतरण झेलने के बाद भी कभी वे अपने पथ से विचलित नहीं हुए, वहीं दूसरी ओर राममंदिर कारसेवा के लिए मंत्री पद त्याग कर उन्होंने सिद्ध कर दिया कि उनके लिए विचारधारा सर्वोपरि थी। आज की राजनीति में जहां परस्पर विवाद, द्वेषपूर्ण प्रतिस्पर्धा, गुटबाजी व व्यवहार में परस्पर असहिष्णुता आम बात है, वहीं असहमति के बाद भी संगठनात्मक संतुलन व परस्पर आदरभाव रखने के विषय में चतुर्वेदी का व्यक्तित्व आदर्श है।
14 अगस्त 1931 को कोटा में जन्मे चतुर्वेदी प्रारंभ से ही मेधावी, अनुशासित और राष्ट्रभावना से ओतप्रोत थे। भौतिक शास्त्र में स्नातकोत्तर कर उन्होंने प्राध्यापक के रूप में सेवा प्रारंभ की, किंतु संघ के सक्रिय स्वयंसेवक होने के कारण उन्हें 13 वर्षों में 11 बार स्थानांतरण झेलना पड़ा। यह परिस्थितियाँ जहां किसी सामान्य व्यक्ति को विचलित कर सकती थीं, वहीं चतुर्वेदी ने हर स्थान को संगठन विस्तार का केंद्र बना दिया। वे जहां जाते वहीं संघ कार्य में जुट जाते।
सन 1966 में उन्होंने स्थायी सरकारी सेवा को त्याग कर जनसंघ के संगठन मंत्री के रूप में पूर्णकालिक जीवन अपनाया। मोटरसाइकिल पर सुदूर गांवों तक पहुंचकर उन्होंने कार्यकर्ताओं की सशक्त श्रृंखला खड़ी की। आपातकाल के दौरान उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा हेतु संघर्ष किया और जेल भी गए।
विधायक के रूप में 21 वर्षों का प्रभावशाली सफर : सन 1977 में ललित किशोर चतुर्वेदी पहली बार कोटा से विधायक निर्वाचित हुए। इसके बाद वे 1980, 1985, 1990 और 1993 में लगातार विजय प्राप्त कर लगभग 21 वर्षों तक विधानसभा में जनप्रतिनिधित्व करते रहे। इस दौरान भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व बनी सरकारों में वे कैबिनेट मंत्री बने और विद्युत, सिंचाई, सार्वजनिक निर्माण, चिकित्सा, शिक्षा, उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी जैसे महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व संभाला। कोटा में दो विधानसभा चुनावों उनकी पराजय भी हुई, लेकिन वे कर्मक्षेत्र में जुटे रहे। फिर वे राज्यसभा के सांसद् बने।वहां उनकी भूमिका संतुलित, अध्ययनपूर्ण और राज्यहित के प्रति समर्पित रही। 1988- 89 तथा पुनः 2003-2006 तक भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को मजबूती प्रदान की।
मर्यादापूर्ण आदर्श अदावत : प्रेरक प्रसंग : राजनीतिक जीवन में भैरोंसिंह शेखावत के साथ उनके संबंधों को “मर्यादापूर्ण आदर्श अदावत” के रूप में याद किया जाता है। दोनों के बीच कई बार वैचारिक मतभेद और कार्यशैली को लेकर असहमति रही, विशेषकर संगठनात्मक निर्णयों और राजनीतिक रणनीतियों के संदर्भ में, किंतु उल्लेखनीय यह रहा कि इन मतभेदों के बावजूद दोनों नेताओं ने कभी भी व्यक्तिगत स्तर पर मर्यादा का उल्लंघन नहीं होने दिया। जब- जब परिस्थितियाँ चुनौतीपूर्ण हुईं, तब-तब दोनों ने संगठन और जनहित को सर्वोपरि रखा। इस अदावत में चतुर्वेदी को भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष पद से कार्यकाल के मध्य ही त्यागपत्र देना पड़ा, ऐसी स्थिति में उनसे कोई अनावश्यक टिप्पणी न हो जाएं, उन्होनें कुछ दिन मौनव्रत ले लिया। अनेक अवसरों पर सार्वजनिक मंचों पर मतभेद स्पष्ट दिखे, परंतु निजी संबंधों में सम्मान और संवाद की परंपरा कायम रही। यह भी उल्लेखनीय है कि जब राजनीतिक परिस्थितियों में तनाव बढ़ा, तब प्रेस द्वारा पूछने पर चतुर्वेदी प्रायः कहते थे, राजस्थान भाजपा में कोई गुट नहीं है, यदि कोई गुट है तो मैं शेखावत गुट का पहला सदस्य हूं। यह प्रसंग उनकी आत्मसंयमित नेतृत्व शैली को दर्शाता है।
आज के दौर में, जब राजनीतिक असहमति अक्सर व्यक्तिगत विवाद का रूप ले लेती है, तब चतुर्वेदी और शेखावत के बीच की यह मर्यादित अदावत लोकतांत्रिक परंपराओं की एक आदर्श मिसाल के रूप में देखी जाती है। यह भी संयोग ही माना जायेगा राजस्थान की राजनीति में जीवनभर साथ रहे चतुर्वेदी उस दिन भी राज्यसभा में सांसद् के रुप में मौजूद थे, जब उपराष्ट्रपति पद छोडने के बाद राज्यसभा में शेखावत को विदाई दी गयी। उस दिन सदन में हुए सभी विदाई भाषणों में चतुर्वेदी का भाषण अधिक भावात्मक था। शेखावत ने भी चतुर्वेदी से विविध विषयों असहमति के बाद भी कभी मन छोटा नहीं रखा। शेखावत ने कभी चतुर्वेदी के टिकट, चुनाव, मंत्री पद, सहयोगी शासन सचिव का चयन, विकास प्रस्ताव व स्थानांतरण अधिकारों में दखल नहीं किया।
कारसेवा के लिए पद का त्याग : 1992 में राममंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने मंत्री पद का त्याग कर कारसेवा में भाग लिया। यह निर्णय उनके जीवन की वैचारिक दृढ़ता और त्याग की भावना को दर्शाता है। 6 दिसम्बर 92 को अयोध्या में रामजन्मभूमि पर विवादित ढांचा ढहने के बाद शाम को चतुर्वेदी का मंच भाषण हुआ, चेहरे पर विजयी गौरव था, उन्होनें कहा था-“राजस्थान का निर्माण मंत्री त्यागपत्र देकर आया है, कारसेवा तो होनी ही थी”
प्रत्येक पत्र का उत्तर : चतुर्वेदी की कार्यशैली का एक अनूठा पक्ष यह था कि वे प्रत्येक पत्र का उत्तर देते थे। चाहे कोई साधारण कार्यकर्ता हो या आम नागरिक—वे सभी की बात को गंभीरता से लेते और उत्तर देकर आत्मीयता का भाव प्रकट करते थे। वे कार्यकर्ता के काम के लिये अनुशंषा पत्र लिखने वाले नेता को भी पत्रोत्तर में कार्य की प्रगति, स्थिति या कार्य संभव -असंभव होने की सूचना देते थे।
मित्रता के पक्के : मित्रता निभाने में भी चतुर्वेदी आदर्श है। वे प्रदेश में जहां भी दोरे पर जाते पार्टी पदाधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के अलावा अपने पुराने सहयोगी मित्रों को सूचना अवश्य करते थे। उदयपुर में महाविद्यालय अध्यापनकाल में संघकार्य में उनके प्रमुख साथी रहे, आलोक संस्थान के संस्थापक श्यामलाल कुमावत। चतुर्वेदी किसी पद पर रहे या न रहे कुमावत के प्रति उनका स्नेह व मित्रता अपरिवर्तनीय रही। इस मित्रता से कुछ प्रमुख नेताओं की अप्रसन्नता को चतुर्वेदी ने सदैव सिरे से नजरअंदाज कर अपनी मित्रता को निर्बाध रखा। जो शासन पद पर रहकर मित्र को न भूल हो, ऐसे चंद उदाहरणों में कुमावत-चतुर्वेदी की मित्रता भी एक प्रमुख उदाहरण है।
महाप्रयाण : 5 अप्रैल 2015 को उनका निधन हुआ, किंतु उनका जीवन आज भी कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है। चतुर्वेदी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि सिद्धांत, सेवा और मर्यादा की जीवंत मिसाल थे— ऐसे जननेता, जिनकी राजनीति में विचार था, व्यवहार में विनम्रता और जीवन में पूर्ण समर्पण।
(लेखक भाजपा के नेता है, चतुर्वेदी के सम्पर्क में रहे है।)
