वेदों में वर्णित आदर्श को जल संरक्षण के लिए करना होगा स्वीकार- प्रो. सारंगेदेवोत

तीन दिवसीय प्रथम अंतरराष्ट्रीय जल सम्मेलन के दूसरे दिन
प्रकृति को मानव की चुनौति का परिणाम है: बाढ व सूखा – मंत्री अर्जुन लाल बामनिया
विश्व में शोषण, प्रदूषण एवं अतिक्रमण मुक्त विहीन विद्या की आवश्यकता है – डॉ. राजेन्द्र सिंह

उदयपुर 9 दिसंबर / विश्व में सूखे व बाढ की वैश्विक समस्या पर जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय) एवं विश्व जन आयोग स्वीडन के संयुक्त तत्वावधान में भारत में पहली बार आयोजित विश्व जल सम्मेलन के दूसरे दिन जनजातीय उद्योग एवं विकास मंत्री राजस्थान सरकार, अर्जुन लाल बामणिया ने संबोधित किया। अपने उद्बोधन में मंत्री बामनिया ने बाढ व सूखा को मानव द्वारा प्रकृति को दी गई चुनौति घोषित करते हुए पहाडों पर वृक्षों के कटाव को मृदा ह्ास का कारण बताया। बामनिया ने वृक्षारोपण को मनरेगा से जोडने का आव्हान करते हुए बांसवाडा जिले का उदाहरण दिया जहां यह नवाचार सार्थक सिद्ध हुआ है।
कुलपति प्रो. शिव सिंह सारंगदेवोत ने जानकारी देते हुए बताया कि शुक्रवार को चार तकनीक सत्रों में 16 सब थीम पर चर्चा हुई।  डॉ. इंदिरा खुराना व प्रो. मिलाप पूनिया  की अध्यक्षता में आयोजित प्रथम तकनीकी सत्र में डॉ. प्रेमनिवास शर्मा ने विश्व बढते मिथेन गैस प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करते हुए इसका समाधान हिमालय क्षेत्र की सीढीदार खेती को बताया।
मैग्सेसे पुरस्कार विजेता व सूखा एवं बाढ के विश्व जन आयोग , स्वीडन के अध्यक्ष वाटर मैन ऑफ इंडिया डॉ राजेंद्र सिंह ने अध्यक्षता करते हुए मैग्सेसे पुरस्कार विजेता व सूखा एवं बाढ के विश्व जन आयोग , स्वीडन के अध्यक्ष वाटर मैन ऑफ इंडिया डॉ राजेंद्र सिंह ने माउंट सिनाइ का उदाहरण देकर वर्षा जल के प्रवाह को धीमा कर सुखाड़ की समस्या का समाधान की जानकारी दी। विश्व जन आयोग को  डॉ. सिंह ने इसे आम आदमी की बुद्धिमत्ता पर विश्वास करने वाली संस्था  बताते हुए निंयुक्त 30 कमीश्नर्स का आव्हान किया कि वे आम जन से जुड योजनाओं को मूर्त रूप प्रदान करें।
नेपाल का प्रतिनिधित्व करते हुए दीपक ग्वाली ने पारिस्थितिकी विखण्डन में औद्योगिक क्रांति की  अहम भूमिका स्पष्ट करते हुंए हाइड्रो इकोलॉजिकल जोन की स्थापना को आवश्यक बताया । साथ ही जल संरक्षण से जुडे कार्यकर्ताओं से आशावादी रहने की बात कही क्योंकि  किसी नवाचार परक संसाधनों को जन स्वीकृति मिलने में समय लगता है, जैसे गोबर गैस को पहले आम स्वीकृति नहीं मिली थी।
युवा आंत्रप्यनोर वरुण शर्मा ने प्रति व्यक्ति बढ़ता उपभोग व पर्यावरण में परिवर्तन को भारत में जल की कमी का मूल मानते हुए भारत का 54 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र को पानी की कमी से त्रस्त बताया  जिसमें राजस्थान भी है। इसका समाधान वरूण ने जल वाष्प को पेयजल में परिवर्तित कर सकने वाले इजरायली पेटेंट वाल एयर वाटर कनवर्टर को बताया ।
माबाद पीस सेंटर एन्ड कम्युनिटी, मिस्र की मोना ने माउंट सिनाई से बहने वाले जल स्रोत के संरक्षण व पुनरूद्धार के लिए इस्राइल व फिलिस्तीन के साझा प्रयासों  को जिसके सकारात्मक परिणाम से प्रेरित हो नील नदी के संरक्षण, पुनररूद्धार  का कार्य किया जा रहा है। इस हेतु नए डिजाइन का निर्माण कर डेम निर्माण किया जा रहा है। मोना के मत में पारिस्थितिकी संतुलन में आंतरिक जल प्रवाह को भी पुनः संरक्षण की आवश्यकता है क्योंकि जब सभ्यता की बात होती है तो केवल सतही जल प्रवाह की ही बात होती है।
डॉ दिलीप जैन ने अपनी प्रस्तुति में बताया कि अति जल दोहन ने पाली जिले के जवाई बांध में सतही जल को समाप्त कर दिया है। इसका दुष्परिणाम जंगली जानवरों पर पड रहा है क्योंकि वे सतही जल का ही उपभोग करते हैं। साथ ही अब प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के स्थान पर क्रय करने पर जोर दिया जा रहा है।

विश्व जल सम्मेलन का द्वितीय सत्र प्रो. शिव सिंह सारंगदेवोत एवं जेएनयू प्रो. कौशल कुमार शर्मा की अध्यक्षता में आयोजित हुआ। अपने आरंभिक उद्बोधन में प्रो. कौशल कुमार शर्मा ने किसी भी कार्य को करने से पहले व्यूह रचना बनाने की आवश्यकता पर बल दिया । प्रो. शर्मा ने कहा कि मानव जल संरक्षण के तरीकों से परिचित हैं लेकिन लालच उसे ऐसा करने से रोकता है। जिसके परिणामस्वरूप गोमुख की पवित्र गंगा नदी कालांतर में प्रदूषित हो जाती है।
छत्तीसगढ के संभागी संजय सिंह ने जल संरक्षण, संवर्द्धन में महिलाओं की भूमिका को स्पष्ट करते हुए 400 जल सहेलियों (वोमन वाटर वारियर्स ) द्वारा विगत 8 वर्षों में बुंदेलखंड में किए गए कार्यो की सफलता की कहानी प्रस्तुत की जिसमें  100 गांवों  के 25 परम्परागत  चन्देल व बुन्देल जलाश्रयों  को पुनर्जीवित किया गया । साथ ही जल रोको अभियान के तहत 900 नए जल स्रोत स्थापना से जल उपलब्धता में वृद्धि के होलीस्टिक प्रयासों के बारे में बताया।
डॉ.बसन्त माहेश्वरी ने बताया कि गुर्जर जात्रा का इस्तेमाल से भूजल संरक्षण एवं पुनर्भरण के परम्परागत ज्ञान को कृषकों तक स्थानीय भाषा में पहंुचाने के लिए किया जाता है। इस कदम को केंद्र सरकार ने स्वीकार कर अटल भू जल योजना के रूप में भारत के 7 राज्यों में प्रारंभ किया है।
आशुतोष तिवारी ने स्वीडन में एक वैश्विक आंदोलन प्रारंभ किया है जिसमें विश्व स्तर के टेक्नोक्रेट, प्रत्येक क्षेत्र के विषय विशेषज्ञ एक साथ आकर एक विश्व, एक पर्यावरण या क्लाइमेट न्युट्रेलिटी की धारणा पर कार्य रहे हैं।
प्रो तेजवीर राणा ने घटते जल संसाधनो को प्रवास का एक कारण बताया। सामुदायिक इच्छा शक्ति कि चलते  जोधपुर जिले के बिटन गांव में प्रारंभ किए गए जल संग्रहण का परिणाम है कि आज  यह पंचायत राजस्थान की सबसे धनवान पंचायत है । क्योंकि पशुओं द्वारा इसका उपयोग किए जाने से दूध का उत्पादन भी बढा है, परिणामस्वरूप आर्थिक स्थिति भी मजबूत हुई है।
डॉ. नेहपाल सिंह पश्चिमी राजस्थान के जल संरक्षण संसधानों को विश्व स्तर पर आदर्श के रूप में स्वीकार करने की जानकारी दी।
सत्यनारायण ने पर्यावरण संरक्षण में जन सहभागिता अत्यंत आवश्यक पर बल देते हुए अमरावती के पुराने जलाशय का एवं  काकीनाडा के मैंग्रोव जंगल को बचाने के लिए स्वयं की संस्था के प्रयासों के बारे में बताया।
डॉ. अभिनन्दन सेकिया ने कहा कि धीमा लेकिन सतत प्रयास जल संरक्षण को सार्थक बना सकता है। साथ ही जनजाति परम्परा का लाभ लेना उपयागी साबित होता है।
पीपुल्स विजिलेंस कमेटी ऑन ह्यूमन राइट्स , बनारस से श्रुति नागवंशी ने भोजन के अधिकार के साथ जल संरक्षण का प्रयासों की जानकारी दी। महिलाओं की स्वास्थ्य समस्याओं एवं महिलाओं को योन हिंसा से बचाने का प्रयासों को  जल संरक्षण से जोड़ संस्था द्वारा किए जारहे अभिनव प्रयासों पर सदन का ध्यानाकर्षण किया। वहीं लहरतारा तालाब का परम्परागत तरीके से पुनर्जीवित करने के बारे में सदन को बताया।
अरुणिमा ने जल साक्षरता के लिए विद्यालयों में रेसिडेंशियल केम्प आयोजित ’विद्यालय जन सम्वाद’ कार्यक्रम, आओ नदी को जाने नामक ऑनलाइन कोर्स की जानकारी दी वहीं उच्च शिक्षा में ’आओ नदी को जाने’ सरीखे कार्यक्रमों की उपादेयता स्पष्ट की साथ ही किसानों के आपसी संवाद के किसान जाग्रति शिविर के संदर्भ को स्पष्ट किया ।
अपने उद्बोधन में कुलपति प्रो. सारंगदेवोत ने पुराणों में जल की विशद व्याख्या को अधिरेखांकित करते हुए जल को स्रृष्टि का केन्द्र बिंदु बताया। साथ ही वेेदों में वर्णित जल के नौ प्रकारों को बताते हुए उनकी प्रकृति के अनुरूप संवर्द्धन , संरक्षण की बात कहीे। साथ ही विगत 20 वर्षों में बाढ व सूखे के कारण सर्वाधिक जन हानि पर चिंता व्यक्त की। साथ ही दो मिलियन से अधिक लोग वाटर स्ट्रेस से जूझ रहे हैं। इसके निराकरण हेतु पारंपरिक तरीकों से जल संग्रहण को बढाए जाने की आवश्यकता पर बल दिया।
आयोजन में भारतीय सांस्कृतिक निधि चैप्टर भीलवाडा द्वारा प्रकाशित स्मारिका का विमोचन किया। समारेाह में मंत्री बामणिया का कुलपति प्रो.़ सारंगदेवोत ने पगड़ी, उपरणा, बुके एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया।
इस अवसर पर प्रो. सुमन पामेचा, रजिस्ट्रार डॉ. हेमशंकर दाधीच, डॉ. अमृता दाधीच,  भरत आमेटा, दिलीप जारोली, डॉ. युवराज सिंह राठौड, डॉ. पंकज रावल, डॉ. हेमेन्द्र चौधरी, डॉ. धमेन्द्र राजौरा, डॉ. हीना खान, डॉ. नीरू राठौड, डॉ. दिलीप सिंह चौहान, डॉ. सुनिता मुर्डिया, डॉ. रचना राठौड, डॉ. बलिदान जैन, डॉ. अमी राठौड, डॉ. तरूण श्रीमाली, डॉ. दिनेश श्रीमाली, डॉ. अपर्णा श्रीवास्तव, डॉ. मधू मुडिया, डॉ. गुणाबाला आमेटा, शीतल चुग, डॉ. अमित बाहेती, डॉ. प्रेरणा भाटी, आशीष नंदवाना  सहित विद्यापीठ के डीन, डायरेक्टर एवं कार्यकर्ता उपस्थित थे।

समापन समारोह शनिवार को:-

आयोजन सचिव डॉ. युवराज सिंह राठौड ने जानकारी देते हुए बताया कि शनिवार को इस आयोजन का समापन विश्वविद्यालय के आई टी सभागार में प्रातः 11़.30 बजे से होगा। इस समारोह के मुख्य अतिथि महाराणा प्रताप कृषि विश्वविद्यालय, उदयपुर के पूर्व कुलपति प्रो. एन.एस. राठौड,  राजस्थान लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. शिव सिंह राठौड होगे।

By Udaipurviews

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