जागरूकता के अभाव में आमजन अपने अधिकारों से वंचित, आवश्यकता है एक्ट का प्रचार प्रसार करने की – आरसी झाला

मानवाधिकार दिवस पर जागरूकता पखावडे़ का हुआ आगाज
अधिकारों के प्रति सजग व संवैदनशील रहने की जरूरत  – प्रो. सारंगदेवोत
भारतीय मानवाधिकार ,  अधिकार नहीं यह एक जीवन शैली है – प्रो. सारंगदेवोत
आमजन अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी करें पालन …….

उदयपुर 06 दिसम्बर। जो अधिकार संविधान में दिये गये है वही अधिकार मानवाधिकार में भी दिये गये है जिसमें जीने का, समानता का व गरिमापूर्ण जीने का अधिकार दिया गया है। सुप्रिम कोर्ट ने इसे ओर विस्तृत करते हुए सिर्फ गरिमापूर्वक जीने के अधिकार तक सीमित नहीं रखते हुए सम्मान पूर्वक जीने अधिकार को सम्मिलित किया जिसमें कई अधिकार दिये है जिसमें शिक्षा, चिकित्सा एवं निशुल्क विधिक सहायता का भी अधिकार मिला है, लेकिन जागरूकता के अभाव में आमजन अपने अधिकारों से वंचित है। अधिकार के साथ हमारे कई कर्तव्य भी है। मानवाधिकार से जुड़े प्रावधान और योजनाएं तो है लेकिन इसका सही क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। इसकी जिम्मेदारी सरकार, एन.जी.ओ. के साथ-साथ हम सभी की है। प्राचीन समय में चौपालों पर न्याय होता था, क्योकि वहॉ का मुखिया पुरे गांव की समझ रहता था आज कोर्ट में कागजी न्याय होता है। आज घरेलु महिलाओं के साथ उत्पीडन की सबसे बडी समस्या है लेकिन व परिवार एवं समाज के डर से अपने उपर हुए अत्याचारों को सहती रहती है। अधिवक्ताओं का दायित्व है कि वे इन्हे उचित न्याय दिलायंे। उक्त विचार शनिवार को राजस्थान विद्यापीठ के संघटक विधि महाविद्यालय के प्रशासनिक भवन में मानवाधिकार दिवस पर जागरूकता पखवडे़ का शुभारंभ करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर के पूर्व न्यायाधीश एवं राज्य मानवाधिकार आयोग के सदस्य आर.सी. झाला ने बतौर मुख्य अतिथि व्यक्त की। इस अवसर पर संविधान निर्माता एवं भारत रत्न बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की पुण्य तिथि पर अतिथियों द्वारा उनके चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हे नमन किया। झाला ने कहा कि मानवाधिकार में 43 एक्ट दिये गये है। विभिन्न प्रकरणों पर हुए निर्णयों को विधि के विद्यार्थियों के सम्मुख रखा। मानवाधिकार की प्रक्रिया को बताते हुए कहा कि आम व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करने का जिम्मा विधि के विधार्थियों का है। इसमें अपील करने का बहुत ही सरल तरीका है,  बहुत सी बार आयेाग के सदस्य अखबारों की सूचना से भी उस विषय पर संज्ञान ले लेता है।
अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. एस.एस. सारंगदेवोत ने कहा कि व्यक्ति जब जन्म लेता है तभी से उसे उसके अधिकार मिल जाते है और जो अधिकार मिलते है वो शाश्वत होेते है। मनुष्यता ही मानवाधिकार है, भारतीय मानवाधिकार ,  अधिकार नहीं यह एक जीवन शेली है। आज पूरे विश्व मंे मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। आज कई देशों में युद्ध हो रहे है आमजन के साथ पशुता जैसे व्यवहार किया जा रहा है। आज का दिवस संकल्प लेने का दिवस है। मानवाधिकार हमारी प्राचीन परम्परा का हिस्सा है। यहॉ हमारा दर्शन व एक अवधारणा है। हम प्रचीन काल से सर्वे भवंतु सुखीनाम की बात करते है इनके भावो में ही अधिकार निहित है। हमारे धार्मिक गंथों में जो मावाधिकारों की रक्षा की बात कही गयी है, उसी के अनुरूप 10 दिसम्बर 1़948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र जारी कर पहली बार मानवों के अधिकारों के बारे  में बात रखी थी वर्ष 1950 में संयुक्त राष्ट्र ने हर वर्ष यह दिवस मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य किसी भी इंसान की जिंदगी  , आजादी , बराबरी व सम्मान के अधिकारों के बारे  में जागरूक करना और उन्हे अपना हक दिलाना। आमजन अधिकारों के बारे में बराबर है देश में  लोगों के बीच नस्ल, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य विचार , राष्ट्रीयता व सामाजिक, उत्तपति, सम्पत्ति, जन्म आदि के बारे में भेदभाव नहीं हो सकता।
कुलाधिपति कुल प्रमुख भंवर लाल गुर्जर ने कहा कि संविधान में जो मौलिक अधिकर दिये गये है उसे ही हम मान ले तो उसमें सभी अधिकार समाहित है आवयकता है आमजन को जागरूक करने की। शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में मानवाधिकार से जुड़े अध्यायों को प्रमुखता से शामिल किया जाए इसके जरिए नई पीढ़ी को मानवाधिकारों के प्रति सजग और संवेदनशील बनाया जा सके। महात्मा गांधी ने कहा था कि सामाजिक समरसता और लोकतान्त्रिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए मानवाधिकारों का संरक्षण नितान्त आवश्यक है। दरअसल मानवाधिकार स्वतन्त्रता समानता एवं गरिमा के अधिकार है।

प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए प्राचार्य डॉ0 कला मुणेत ने कहा कि आमजन को जागरूक करने के उद्देश्य सात दिवसीय पखवाडे का आयोेजन किया गया है जिसमें विभिनन प्रतियोगिताए व जागरूकता कार्यक्रम किए जायेंगे। देश को आजाद हुए भले ही कई दशक बीत चुके हों, लेकिन वर्तमान में भी शोषण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। महिलाओं में घूंघट और अंगूठे की निशानी सदियों से चली आ रही है। इसके लिए हमे परिवर्तन लाने की जरूरत है।

संचालन डॉ. रित्वि धाकड ने किया जबकि आभार डॉ. मीता चौधरी ने जताया।

इस अवसर पर डॉ. के.के. त्रिवेदी, डॉ. मीता चौधरी, डॉ. सुरेन्द्र सिंह चुण्डावत, डॉ. ज्ञानेश्वरी राठौड, डॉ. विनिता व्यास, भानु शक्तावत,  डॉ. रित्वी धाकड  सहित अकादमिक सदस्य उपस्थित थे।

By Udaipurviews

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