उदयपुर, 20 सितम्बर : उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना की मांग को लेकर वकीलों का आंदोलन शनिवार को भी जारी रहा। संभागीय आयुक्त कार्यालय के बाहर चल रहे धरना स्थल पर वकीलों ने सामूहिक रूप से सुंदरकांड पाठ का आयोजन कर आंदोलन की सफलता की प्रार्थना की।
आंदोलन को मेवाड़ व वागड़ के अलग-अलग अंचलों से आए वकीलों के साथ सामाजिक व राजनैतिक संगठनों का भी समर्थन मिल रहा है। धरने में पहुंचे नेताओं ने स्पष्ट कहा कि हाईकोर्ट बेंच की स्थापना न्यायपालिका की पहुँच को जन-जन तक आसान बनाने के लिए आवश्यक है।
प्रतापगढ़ जिला अध्यक्ष अरुण पाटीदार और धरियावद जिला अध्यक्ष पुष्कर मेघवाल ने धरना स्थल पर संबोधित करते हुए कहा कि यह केवल वकीलों की मांग नहीं, बल्कि पूरे मेवाड़-वासियों का हक है। उन्होंने ऐलान किया कि जब तक उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना नहीं होती, आंदोलन इसी तरह चरणबद्ध तरीके से चलता रहेगा। वकीलों का कहना है कि लम्बे समय से लंबित इस मुद्दे पर अब सरकार को ठोस निर्णय लेना ही होगा, अन्यथा आंदोलन और व्यापक रूप धारण करेगा।
वहीं, केंद्रीय श्रमिक संगठनों की समन्वय समिति के संयोजक पी.एस. खींची के नेतृत्व में समिति के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने मेवाड़-वागड़ संघर्ष समिति द्वारा संभागीय आयुक्त कार्यालय पर चल रहे धरने में भाग लिया। इस दौरान उन्होंने उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच की स्थापना की मांग को पूरी तरह जायज ठहराते हुए आंदोलन को अपना पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की। धरने में सीटू के हीरालाल सालवी, एटक के हिम्मत चांगवाल, बैंक यूनियन के विनोद कपूर और विजय धाकड़, पोस्टल यूनियन के विनय जोशी, एक्टू के शंकरलाल चौधरी, इंटक के नारायण गुर्जर और अमर सिंह सांखला सहित कई कार्यकर्ता उपस्थित रहे।
साथ ही हाईकोर्ट बेंच स्थापना की मांग को अब पं. दीनदयाल उपाध्याय स्मृति मंच का भी समर्थन मिल गया है। मंच के जिलाध्यक्ष प्रेम ओबरावल ने कहा कि उदयपुर सहित दक्षिणी राजस्थान के लोगों को न्याय के लिए जोधपुर तक जाना पड़ता है। इससे समय, धन और ऊर्जा की भारी बर्बादी होती है। यदि उदयपुर में हाईकोर्ट बेंच स्थापित होती है तो मेवाड़, वागड़, हाड़ौती और आदिवासी क्षेत्रों की जनता को बड़ी राहत मिलेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि मंच की ओर से इस आंदोलन को पूर्ण समर्थन दिया जाएगा और आवश्यकता पड़ी तो चरणबद्ध तरीके से आंदोलन में भागीदारी भी की जाएगी। ओबरावल ने कहा कि यह केवल क्षेत्र की सुविधा का नहीं बल्कि न्याय तक आसान पहुंच का मुद्दा है, जो हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।
