मंथन बाद जारी किया घोषणा पत्र
– 19 देशों के 100 से अधिक पर्यावरणविदों ने लिया भाग ।
– भारतीय संस्कृति-सूत्रों में है पर्यावरणीय समस्याओं का हल – प्रो .सारंगदेवोत
– आदिज्ञान देगा युवाओं को रोजगार और प्रकृति सेवा – डॉ. राजेन्द्र सिंह
– वर्षा जल संचयन – प्रबंधन पर देना होगा ध्यान – बी.एल. गुर्जर
उदयपुर 26 फरवरी / प्रकृति-आदिज्ञान और आधुनिक शिक्षा युक्त व्यवसायिक जीवन में से आज का युवा अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने वाले व्यवसायों को ही चुन रहा है। पर्यावरण और भारतीय ज्ञान आधारित मार्ग से भी रोजगार की प्राप्ति हो सकती है। जो दैनिक आवश्यकताओं के साथ धरती मां की सेवा का सौभाग्य भी युवा पीढ़ी को दे सकता है। ये बात हम सभी को अपने नौजवानों को समझाना होगा साथ ही उसकी व्यवहारिकता से परिचय करवाने के उपरान्त ही हम अपने बच्चों को प्रकृति की ओर लौटा पाएंगे और आने वाले समय के लिए पृथ्वी को जीवन के लिए उपयुक्त स्थान की तरह संजो पाएंगे। इसी से पंच तत्वों से बनी प्रकृति के प्रति आस्था भी उत्पन्न हो पाएंगी।
उक्त विचार बुधवार को तरूण भारत संघ के स्वर्ण जयंती वर्ष पर जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड टू बी विश्वविद्यालय, तरूण भारत संघ, कीवा के संयुक्त तत्वावधान में कुलपति सचिवालय के सभागार में तीसरे दो दिवसीय विश्व जल सम्मेलन के समापन सत्र में प्रसिद्ध पर्यावरणविद् व मैगसेसे पुरस्कार विजेता पानी वाले बाबा डॉ. राजेंद्र सिंह ने बीज वक्ता के रूप में व्यक्त किए। डॉ. राठौड़ ने अपने उद्बोधन में पूर्व में हुए दोनों विश्व जल सम्मेलनों की घोषणा पत्रों और उनकी रोशनी में विश्व भर में हुए कार्यों के बारे में भी जानकारी प्रदान की।
कुलपति प्रो. एस. एस. सारंगदेवोत ने प्रकृति में आ रहे असंतुलन और पर्यावरणीय समस्याओं के सामाधान के लिए हमें हमारी संस्कृति की ओर लौटने की बात कही। उन्होंने बताया कि सतत विकास के लिए भारतीय सूत्र प्रकृति, विकृति, दुष्किृति और संस्कृति को आधार बनाया जाए तो पारिस्थितिकि तंत्र, जैव विविधता संबंधित समस्याओं का हल सहज ही जाएगा। साथ ही हमें वैश्विक कल्याण की बात को ध्यान मंे रखकर याद रखना होगा कि संपूण विश्व एक परिवार के रूप में एक दूसरे जुड़ा हुआ है और हमारे द्वारा किया गया कोई एक काम भी दूसरों के जीवन को किस हद तक प्रभावित करता है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में कुलाधिपति बीएल गुर्जर ने वर्षा जल संचयन और प्रबंधन को प्रमुखता से रखा। उन्होने बारिश के पानी के व्यवस्थित संचयन के लिए स्थानीय और सरकारी दोनों ही स्तरों पर प्रयास की बात की, साथ ही जल पर बनने वाली नीतियों के संदर्भ में उन्होंने भारतीय ग्रामीण और शहरी परिस्थितियों के प्रभावों को विशेष रूप से ध्यान में रखने के बारे में विचार रखे।
मंथन के बाद जारी हुआ घोषणा पत्र और क्रियान्वयन के बिन्दुओं का किया वाचन- समापन सत्र में प्रो. सारंगदेवोत ने दो दिवसीय विश्व जल सम्मेलन में पर्यावरणविदों और आदिज्ञान के विशेषज्ञ प्रतिभागियों के मार्गदर्शन में हुए मंथन से सामने आए बिन्दुओं के आधार पर तैयार किए गए घोषणा पत्र को जारी किया, साथ ही इनको जमीनी हकीकत बनाने के लिए क्रियान्वयन के बिन्दुओं भी सदन के सामने रखा। घोषणा पत्र में भारतीय आदिज्ञान परंपरा से युवा पीढ़ी को जोड़ने ,उससे जुड़े विभिन्न तथ्यों की जानकारी देने और उसमें व्यवसाय और रोजगार का संभावनाओं को प्रकृति के संदर्भों में युवाओं तक पहुंचाने की बात कही गई। इस सबके लिए वैश्विक, सामाजिक, सामुदायिक,शैक्षिक स्तर पर किए जाने वाले प्रस्तावित कार्यों को भी बताया गया।
पश्चिम स्वीडन विवि के प्रो. बसंत माहेश्वरी ने जल के अर्न्तसंबधों को रेखांकित करते हुए भूजल, सतही जल और नदियों के पानी में बताया और कहा कि यदि किसी एक भी प्रकार में असंतुलन होने पर उसका प्रभाव सम्पूर्ण पर्यावरण पर दिखाई देता है। पानी क्योंकि समाज के सामाजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पक्षों से जुड़ा है अतः सामुदायिक और सामुहिक प्रयासों से जागरूकता और बदलाव को परिणामों बदला जा सकेगा।
श्रेष्ठ शोध पत्र के लिए मांजल सारंगदेवोत का किया सम्मान:-
संयोजक डॉ. युवराज सिंह राठौड़ ने बताया कि समारोह मे अतिथियों द्वारा दो दिवसीय जल सम्मेलन के दौरान शोधपत्रों के वाचन में श्रेष्ठ शोधपत्र वाचन के लिए मांजल सारंगदेवोत का उपरणा, स्मृति चिन्ह एवं प्रमाण पत्र देकर सम्मातिन किया।
युवाओं को सहयोग और प्रोत्साहन द्वारा प्रकृति से जोड़े – विरूंगा डूगीर विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए पर्यावरण के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले मेक्सिकन विरूंगा ने कहा कि हमंे जीवन से जुड़े हमारे संस्कारांे और जड़ो से नई पीढ़ी को शिक्षित और संस्कारित करना होगा इसी माध्यम से वो प्रकृति के करीब आ पांएंगे और उसके लिए काम भी कर पाएंगे। हमें अपने युुवाओं को उनके कार्यों के लिए सहयोग के साथ प्रोत्साहन भी देना होगा। तभी उनका प्रकृति के लिए उनके द्वारा किए जाने वाले सकारात्मक प्रयासों पर विश्वास बन पाएगा।
पंचतत्वों के संबंधों से जुड़े है सभी पृथ्वीवासी – मोनजाल्विक ,मोजाम्बिक से आए मोनजाल्विक ने कहा कि हमारी सामस्याएं चाहे किसी भी प्राकृतिक तत्व में असंतुलन की परिणिती हो लेकिन यही पांच तत्व सम्पूर्ण पृथ्वीवासियों को एक दूसरे से जोड़े हुए है। हमारी वर्तमान प्राकृतिक चुनौतियों का हल भी इन पांच तत्वों के आदिज्ञान और वसुधैव कुटुम्बकम के भावों में ही छिपा है। यही कारण है कि हमारे पूर्वज प्रकृति के साथ हमसे कही अधिक शांति की जीवन जी पाए। यहीं हमें सीखना है और युवाओं को भी सीखाना है।
इस विश्व जल सम्मेलन में अफ्रीका , अमरीका, नोर्थ अमेरिका, ऐशिया, युरोप , आस्ट्रेलिया के 19 देशों के पर्यावरणविदों और प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
इस अवसर पर रजिस्ट्रार डॉ. तरूण श्रीमाली, डॉ गीतांजलि , प्रो. सरोज गर्ग, डॉ. अनिल मेहता, डा.ॅ पीके सिंह, डॉ. युवराज सिंह राठौड़ डॉ. पुनीत कुमार, डॉ. रचना राठौड़, डॉ. अमी राठौड, निजी सचिव केके कुमावत, जितेन्द्र सिंह चौहान, डॉ. जयसिंह जोधा, डॉ. नारायण सिंह राव, डॉ. पल्लव पाण्डे्य, डॉ. सरिता मेनारिया, डॉ. हरीश मेनारिया, डॉ. हिम्मत सिंह, डॉ. रोहित कुमावत, डॉ. इंदू आचार्य, डॉ. रोमा भंसाली, डॉ. अमित दवे, डॉ. ललित सालवी, विकास डांगी सहित शहर में पर्यावरण के लिए कार्य करने वाले पर्यावरणविद् , शोधार्थी और गणमान्य लोग उपस्थित थे।
इस मौके पर अतिथियों ने आरोग्य कलेण्डर का विमोचन किया गया। इस कलेण्डर में भारतीय ऋतुओं के अनुरूप जीवनचर्या और पथ्य अपथ्य का उल्लेख किया गया है। इसमें निर्देशित तथ्यों की अनुपालन के द्वारा स्वास्थ जीवन शैली को व्यवहार में लाया जा सकता है।
संचालन डॉ. चन्द्रेछ छतलानी, डॉ. हरीश चौबीसा ने किया जबकि आभार डा.ॅ पंकज रावल ने ज्ञापित किया।
