आचार्य गणेशीलाल जी म.सा. की जन्म जयंती सामूहिक सामायिक आराधना व जाप के साथ मनाई
उदयपुर, 24 जुलाई। केशवनगर स्थित अरिहंत वाटिका में आत्मोदय वर्षावास में बुधवार को शान्त-क्रान्ति के जन्मदाता पूज्य आचार्य श्री गणेशीलाल जी म.सा. की 134वीं जन्म जयंती पर सामूहिक सामायिक आराधना व जाप किया गया। इस अवसर पर आयोजित धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए हुक्मगच्छाधिपति आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने कहा कि महापुरूषों के गुणगान करने से न केवल जिह्वा पवित्र होती है अपितु जीवन भी पवित्र बनता है। जो महापुरूषों के गुणों का श्रवण कर अपने जीवन को सजाते हैं वे अपना जीवन सुधारने के साथ-साथ संवार भी लेते हैं। उत्थान एवं पतन दोनों ही मानव के ही हाथ में हैं। हंस-हंस कर जीना है या रो-रो कर जीना है वो भी स्वयं मानव के ही हाथ में हैं। सृष्टि का नियम है कि सोने वाला खो देता है और जागने वाला पा जाता है। सोना-जगना दोनों हमारे ही हाथ में है। आलस मनुष्य के शरीर में रहा हुआ महान शत्रु है, उसे जीत कर पुरूषार्थ करना ही हमारी फितरत होनी चाहिए। उपाध्याय श्री जितेश मुनि जी म.सा. ने कहा कि दिन की शुरूआत शिष्टाचार से करें। इसके चार चरण हैं-सभी को अभिवादन करें, बड़ों को प्रणाम करें, सभी का अपने समान आदर करें और सभी की कुशलक्षेम की पृच्छा करें। शिष्टाचार के इन चरणों का सहज पालन करने से श्रावक का जीवन प्रशंसनीय बनता है। श्रद्धेय श्री रत्नेश मुनि जी म.सा., महाश्रमणीरत्ना महासती श्री सूर्यकांता जी म.सा. एवं डॉ. हंसा हिंगड़ ने गणेशाचार्य के जीवन पर प्रकाश डाला। संघ मंत्री पुष्पेन्द्र बड़ाला ने बताया कि तीन-तीन सामूहिक सामायिक की आराधना व जाप के साथ आचार्य श्री गणेशीलाल जी म.सा. की जन्म जयंती उल्लासपूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर यशवंत आंचलिया परिवार एवं नरेन्द्र हर्षल हिंगड़ परिवार की ओर से प्रभावना वितरित की गई।
आलस को जीत कर पुरूषार्थ करना ही मानव की फितरत होनी चाहिए: आचार्य विजयराज
