वर्षों से लगे ट्री गार्ड को रीयूज कर बचाया जा सकता है धन
शहर की सुंदरता में भी लग सकते हैं चार चांद
उदयपुर, 18 जुलाई। दक्षिणी राजस्थान में छोटी-बड़ी पहाड़ियों के बीच बसा उदयपुर शहर अपनी हरियाली, सुंदरता, प्राकृतिक छटाओं एवं खूबसूरत झीलों के लिए विश्व पर्यटन मानचित्र पर विशिष्ट स्थान रखता है। वन विभाग, उदयपुर विकास प्राधिकरण, नगर निगम एवं विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाएं शहर को हरा भरा बनाए रखने में वर्षों से अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आ रहे हैं। इन संस्थाओं की ओर से पौधों की सुरक्षा के लिए लगाए जाने वाले ट्री गार्ड का कुछ वर्षों बाद दोबारा उपयोग करने की मुहिम पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अभिनव प्रयास सिद्ध हो सकती है।
सेवानिवृत्त उप वन संरक्षक तथा ग्रीन गुड डीड्स कंसल्टेंट्स के निदेशक लायक़ अली खा़न ट्री गार्ड को रिकवर कर रिपेयरिंग के बाद रीयूज का सुझाव देते हैं। खान के अनुसार कॉलोनी, सड़कों के किनारे, शहर के मुख्य मार्गो, पार्कों, खेल के मैदान, स्कूल कॉलेज एवं कार्यालय परिसरों में प्रतिवर्ष वर्षा ऋतु में अभियान के तौर पर पौधारोपण का कार्य इस आशा के साथ किया जाता है कि यह नन्हें पौधे कालांतर में बड़े होकर वृक्ष का रूप लेंगे और प्रत्यक्ष रूप से जनसाधारण को फल फूल एवं छाया देंगे तथा अप्रत्यक्ष रूप से पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण निवारण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उक्त स्थानों पर पौधारोपण के साथ ही पौधों की सुरक्षा के लिए ट्री गार्ड्स का उपयोग भी करते हैं। उक्त ट्री गार्ड्स सामान्यतया बांस/लकड़ी/ईंटों की चिनाई या लोहे की जालियों के बने होते हैं। बांस या लकड़ी के बने ट्री गार्ड्स लंबे समय तक नहीं चल पाते बल्कि जल्दी ख़राब हो जाते हैं एवं पौधे को अपेक्षित सुरक्षा नहीं दे पाते, परिणाम स्वरुप पौधा नष्ट हो जाता है एवं इस पर किए गए प्रयास निरर्थक हो जाते हैं। ईंटों की चिनाई द्वारा बनाए जाने वाले ट्री गार्ड्स अपेक्षाकृत महंगे होते हैं एवं शहर में सड़क के किनारे स्थान सीमित होने के कारण व्यावहारिक भी नहीं पाए जाते। अंततः लोहे की जाली के ट्री गार्ड्स का उपयोग ही एक सफ़ल प्रयोग सिद्ध हुआ है, जिनकी शरण में नन्हा पौधा वृक्ष का रूप धारण कर लेता हैं।
लायक अली खान का कहना है कि उदयपुर शहर में विभिन्न कॉलोनीज़, पार्कों, परिसरों एवं सड़कों के किनारे पिछले 15-20 वर्षों में यूआईटी, नगर निगम अथवा संस्थाओं द्वारा हजा़रों की तादाद में ट्री गार्ड्स बांटे गए हैं एवं लगवाए गए हैं। यदि लोहे के ट्री गार्ड्स के साथ शुरू में दो-तीन वर्षों तक लगाए गए पौधे की थोड़ी बहुत देखभाल व सिंचाई कर ली जाए तो सरवाइवल परसेंटेज 90 प्रतिशत के लगभग रहता है जो कि एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। स्थानीय मिट्टी एवं जलवायु के अनुरूप लगाए गए स्वस्थ पौधे को 3 से 5 वर्ष के पश्चात एक सुरक्षित ऊंचाई तक पहुंच जाने के कारण ट्री गार्ड्स की आवश्यकता नहीं रहती है।
खान के अनुसार पौधारोपण के साथ लगाए गए 95 प्रतिशत से अधिक ट्री गार्ड्स वर्षों तक यथा स्थान लगे ही रहते हैं और 20 – 25 वर्षों में या तो वृक्ष के तने की गोलाई अधिक हो जाने के कारण टूट जाते हैं या वर्षों की मौसम की मार से धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं। पर्यावरण संरक्षण के प्रति दूरदर्शिता का परिचय देते हुए यदि पुराने ट्री गार्ड को सावधानी से निकालकर दुरुस्त करवा लें तो उनमें रंग रोग़न करवा कर पुनः उपयोग में लिया जा सकता है जो संसाधनों के रीयूज का एक बेहतरीन उदाहरण होगा। उदयपुर शहर की सीमा में 5000 से 10,000 ऐसे ट्री गार्ड्स मिल जाएंगे जिन्हें रिकवर कर रीयूज़ किया जा सकता है।
यह हो सकते हैं लाभ
खान का कहना है कि इस रिकवरी और रीयूज़ से हमें कई डायरेक्ट (प्रत्यक्ष) और इनडायरेक्ट (परोक्ष) लाभ मिलेंगे। पुराने ट्री गार्ड से घिरे हुए वृक्षों की स्वतंत्रता, सुंदरता एवं स्वच्छता में वृद्धि होगी। वहीं नए की अपेक्षा 20 से 25 प्रतिशत मूल्य में पुराने ट्री गार्ड का रियूज किया जा सकेगा। इससे सेमी स्किल्ड कामगारों जैसे वेल्डर एवं पेंटर्स के लिए रोज़गार का सृजन होगा। उदयपुर विकास प्राधिकरण या नगर निगम और संस्थाओं के ख़र्चों में कटौती भी होगी। इसके अलावा शहर राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थियों, संस्थाओं एवं कार्यपालिका को रिकवर, रिपेयर, रीयूज का बेहतरीन संदेश मिलेगा। नये ट्री गार्ड्स बनाने के लिए उपयोग में आने वाले नए लोहे के निर्माण में होने वाले प्रदूषण से बचाव होगा।
यूं अपनाया जा सकता है नवाचार
इस नवाचार को मूर्त रूप देने के लिए जिला प्रशासन के माध्यम से जिले के सभी विभागाध्यक्षों /कार्यालय अध्यक्षों को मई-जून माह में ही एक परिपत्र जारी किया जा सकता है, इसमें उनके परिसर में लगे हुए पुराने ट्री गार्ड्स को निकाल कर दुरस्ती के पश्चात वर्षा ऋतु में नवीन पौधारोपण में पुनः उपयोग में लिए जाने के लिए निर्देशित किया जा सकता है। उदयपुर विकास प्राधिकरण एवं नगर निगम भी इस रीयूज़ ट्री गार्ड्स योजना को अपने-अपने क्षेत्रों में लागू कर सकते हैं। स्कूलों और कॉलेजों के विद्यार्थियों तक भी यह संदेश पहुंचाया जा सकता है। एनसीसी, एनएसएस एवं स्काउट गाइड की भी मदद ली जा सकती है। किसी एक या एक से अधिक स्वयं सेवी संस्थाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करते हुए उक्त कार्य की ज़िम्मेदारी दी जाए तथा स्ट्रिक्ट मॉनिटरिंग भी की जाए तो भी अच्छे परिणाम आ सकते हैं। मोटे अनुमान के आधार पर एक औसत आकार का नया पेंट किये हुए ट्री गार्ड की लागत 700 से 800 रूपए आती है जबकि पुराना ट्री गार्ड 150 से 200 रुपए में रियूज़ के लिए तैयार हो सकता है।
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अभिनव प्रयास सिद्ध हो सकता है ट्री गार्ड का दोबारा उपयोग
