मुगल सेना पर जीत की खुशी में आज भी मेनार में गरजती है तोपें, बन्दूकों से होती है सलामी

उदयपुर, 07 मार्च। देश में होली का त्यौहार रंगों से मनाया जाता है, लेकिन हर क्षेत्र में होली मनाने की कुछ अलग परंपराएं हैं, उसके पीछे अलग अलौकिक कहानी होती है। ऐसी ही एक अनोखी होली मनाई जाती है राजस्थान के उदयपुर जिले के मेनार में। होली के दूसरे दिन द्वितीया पर जमरा बीज महोत्सव मनाया जाता है। इस महोत्सव के लिए दूर शहरों में जा बसे गांववासी भी लौटते हैं और इसका हिस्सा बनते हैं।

दरअसल, यह महोत्सव इतिहास में मुगलों पर जीत का जश्न है।
उदयपुर जिले से 45 किलोमीटर दूर चितौड़गढ़ मार्ग पर दो सरोवरो के बीच स्थित मेनार गांव में मेवाड़ के शूरवीरों ने मुगलों को धूल चटाई थी, 500 साल पहले हुए इस युद्ध की स्मृति को मेनार गांव में हर साल दोहराया जाता है। स्मृति जश्न भी कोई सामान्य नहीं, बंदूक और तोपें आग उगलती हैं और इनकी आवाज की गूंज गांव से 5 किलोमीटर के दायरे में सुनाई पड़ती है। यही नहीं तलवारें धार से चमक उठती हैं। खास बात यह है कि इस बारूद की होली में किसी प्रकार का पुलिस बल नहीं लगाया जाता है, इसकी जरूरत भी नहीं होती। ग्रामीणों में इतना अनुशासन है कि बारूद की होली खेलते हुए कभी कोई झगड़ा, जन हानि या अन्य नुकसान नहीं होता है। यहां होली को दीपावली की तरह मानते हैं, क्योंकि यहां का सबसे बड़ा त्यौहार जमरा बीज महोत्सव है।

त्यौहार की शुरुआत होली के अगले दिन रात की एक बजे रण बांकुरे ढोल की थाप से होती है। गांव के 5 स्थानों पर दो ढोल एक साथ दस-दस मिनट के अंतराल में बजते हैं जो 36 पहर तक बजते रहने के साथ ही शहीदों को सलामी, तलवारों के गैर नृत्य एवं आग उगलते गोटे घुमाने के करतब के साथ जमरा बीज का जश्न थमता है।

कार्यक्रम की शुरुआत दिन में ओंकारेश्वर चौराहे पर गांव के सभी लोगों के एकत्र होने के साथ ही शुरू होती है। पूरे साल का लेखा-जोखा देखा जाता है। पूरे साल में गांव में कितने बच्चे हुए इसकी जानकारी ली जाती है। पूरा गांव दुल्हन की तरह सजता है। गांव का मुख्य चौराहा सतरंगी रोशनियों से सजा होता है। रात करीब साढ़े दस बजे पांच गलियों से सैकड़ों लोग बंदूकों का हवाई फायर करते हुए मुख्य चौराहे पर दौड़ पड़ते हैं। यह दृश्य युद्ध से कम नहीं लगता। करीब दो पहर अनवरत आतिशबाजी होती है। आतिशबाजी भी ऐसी कि दो घंटे तक एक सेकंड के लिए भी आवाज नहीं थमती। फिर पांचों टीम युद्ध के लिए तैयार होती है और हमले के आदेश पर पांचों चौक पर एकत्र होती है। बंदूकों-तोपों की बौछार होती है। चारों तरफ धुंआ और तेज आवाजों से इलाका गूंज उठता है।

इस दौरान महिलाओं के सिर पर लोटा होता है जिसमें पानी व भुजिया होता है जो होलिका को व शहीदों को अर्घ्य देती हैं।

धुलेंडी के दिन गांव के सभी लोग साल भर में किसी के घर में गम होने की स्थिति में उस परिवार को ढांढस बंधाने के साथ जमरा बीज महोत्सव में शामिल होने का कहने के लिए रण बांकुरे ढोल के साथ पहुंचते हैं। इसी रात्रि गांव में पिछली होली से इस होली तक जन्में बच्चों का ढूंढोत्सव मनाया जाता है।

500 साल से चली आ रही इस परंपरा को निभाने के लिए सभी गांव वाले मेवाड़ी पोशाक में होते हैं। पोशाक में धोती-कुर्ता और कसूमल पाग पहने होते हैं। राजस्थान इतिहास में कर्नल जेम्स टॉड ने भी मेनार का उल्लेख अपनी पुस्तक ‘द एनालिसिस ऑफ राजस्थान’ में मणिहार नाम के गांव के नाम से किया है।

हर समाज का रहता है योगदान

– गांव में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार माधव मेनारिया बताते हैं कि खास बात यह है कि इस महोत्सव में गांव में निवास करने वाली समस्त जाति बिरादरी का योगदान होता है। गांव के मीणा समाज का योगदान सुरक्षा में रहता है तो जैन समाज गुलाल डालने की रस्म निभाता है। इसे शांति का प्रतीक माना जाता है। गुलाल डालने के साथ ही आतिशबाजी थम जाती है। मेघवाल समाज चौराहे पर पीली मिट्टी से लिपाई की रस्म निभाता है। तेली समाज मशाल तेल देने का, प्रजापत समाज मटके एवं नाई वेद समाज मशाल थामने की रस्म निभाते हैं।

विश्वकर्मा समाज होलिका दहन से पूर्व खाण्डियां देने की रस्म निभाता है। ऐसा माना जाता है कि खाण्डियां को होलिका दहन के समय आग में एक छोर से जलाने के बाद उस छोर से मिट्टी में धँसाने के बाद वहां बीज का रोपण करने से कद्दू-लौकी की पैदावार अच्छी होती है।

यह है इतिहास

मेवाड़ पर महाराणा अमर सिंह का राज्य था। उस समय मेवाड़ की पावन धरा पर जगह-जगह मुगलों की छावनियां थीं। इसी तरह मेनार में भी गांव के पूर्व दिशा में मुगलों ने अपनी छावनी बना रखी थी। इन छावनियों के आतंक से लोग दुखी थे। मुगल छावनी के आतंक से हर कोई त्रस्त था। जब मेनारवासियों को वल्लभनगर छावनी पर विजय का समाचार मिला तो गांव के वीरों की भुजाएं फड़क उठीं। गांव के वीर ओंकारेश्वर चबूतरे पर इकट्ठे हुए और युद्ध की योजना बनाई गई। उस समय गांव छोटा और छावनी बड़ी थी। समय की नजाकत को ध्यान में रखते हुए कूटनीति से काम लिया गया। इस कूटनीति के तहत होली का त्यौहार छावनी वालों के साथ मनाना तय हुआ। होली और धुलंडी साथ-साथ मनाई गई।

यह दिन चैत्र माघ कृष्ण पक्ष द्वितीया विक्रम संवत 1657 की रात्रि को राजसी गैर का आयोजन किया गया। गैर देखने के लिए छावनी वालों को आमंत्रित किया गया। ढोल ओंकारेश्वर चबूतरे पर बजाया गया। नंगी तलवारों, ढाल और हेनियों से गैर नृत्य शुरू हुआ। अचानक ढोल की आवाज ने रणभेरी का रूप ले लिया। गांव के वीर छावनी के सैनिकों पर टूट पड़े। रात भर भयंकर युद्ध चला। ओंकार महाराज के चबूतरे से शुरू हुई लड़ाई छावनी तक पहुंच गई और मुगलों को मार भगाया गया। इस विजय के उपहार में तत्कालीन महाराणा ने मेनार को 17वें उमराव की उपाधि प्रदान की थी। मेनारवासियों से 52 हजार बीघा जमीन पर लगान नहीं वसूला गया। मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह प्रथम ने मुगलों पर विजय की खुशी में मेनार को शौर्य के उपहार स्वरूप शाही लाल जाजम, नागौर के प्रसिद्ध रणबांकुरा ढोल, सिर पर किलंगी धारण करने का अधिकार प्रदान किया, और यह परंपरा आज भी कायम है।

फोटो – माधव मेनारिया

By Udaipurviews

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