आत्मा के परमानंद को प्राप्त करने के लिए स्वभाव को प्रकट करना जरूरी है: आचार्य विजयराज

तेले की तपस्या की लड़ी आज से
उदयपुर, 18 जुलाई। केशवनगर स्थित अरिहंत वाटिका में आत्मोदय चातुर्मास में शुक्रवार से तेले की तपस्या की लड़ी प्रारम्भ होने जा रही है। उदयपुर श्रीसंघ के अध्यक्ष इंदर सिंह मेहता ने बताया कि तीन दिवसीय तेला तप की आराधना आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. एवं उपाध्याय श्री जितेश मुनि जी म.सा. की निश्रा में शुक्रवार से प्रारम्भ होगी। इस हेतु कई श्रावक-श्राविकाएं तेला तप करेंगे। वहीं गुरूवार को धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए हुक्मगच्छाधिपति आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने कहा कि मन की शान्ति, बुद्धि की स्थिरता एवं आत्मा के परमानंद को प्राप्त करने के लिए स्वभाव को प्रकट करना जरूरी है और यह पुरूषार्थ द्वारा ही संभव है। जैन दर्शन में स्वभाव कंडिशनल नहीं अपितु तार्किक होता है क्योंकि मनुष्य के पास मन, बुद्धि और आत्मा है। इन तीनों का उपयोग करके ही हमें त्यागमय जीवन जीना चाहिए क्योंकि यही सबसे कीमती पारसमणि है। सुखी रहने का सूत्र है-जो हुआ अच्छा हुआ, जो होगा वह अच्छा होगा, ऐसी अपनी सोच बना लें तो मन की शान्ति, बुद्धि की स्थिरता और आत्मा में आनंद प्रकट हो जाएगा। उपाध्याय श्री जितेश मुनि जी म.सा. ने धर्मसभा में कहा कि पर निंदा व दूसरों में अवगुण देखने की प्रवृत्ति से बचो क्योंकि पर निंदा करते समय नफरत व घृणा फैलाते समय आयु का बंध हो गया तो सद्गति कभी नहीं मिलेगी। सद्गति चाहते हैं तो बुराई का प्रदूषण बंद कर सदगुणों का प्रसार करने की आदत डालें।

By Udaipurviews

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