डिजिटल दक्षता, साहित्य समीक्षा और शोध पत्र लेखन पर गहन प्रशिक्षण
उदयपुर, 10 मार्च। ‘मंडला 2026ः प्लेसेंटली इन्क्लूसिव’ के तहत मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर में आयोजित दो दिवसीय शोध पत्र लेखन कार्यशाला का दूसरा दिन 10 मार्च 2026 को तकनीकी एवं प्रायोगिक सत्रों के साथ युवा शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित हुआ। दिन की शुरुआत विश्वविद्यालय के कंप्यूटर सेंटर में आयोजित सत्र से हुई, जिसमें डॉ. अविनाश पंवार द्वारा प्रतिभागियों को डै ॅवतक, डै म्Ûबमस और डै च्वूमतच्वपदज जैसे बुनियादी डिजिटल टूल्स के शोध एवं अकादमिक लेखन में सुव्यवस्थित उपयोग का प्रशिक्षण दिया गया। इस सत्र में दस्तावेज़ फॉर्मैटिंग, टेबल-तैयारी, ग्राफ़ और चार्ट बनाना, रेफरेंस सम्मिलित करना तथा प्रस्तुतीकरण कौशल पर विशेष बल दिया गया। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टूल्स के जिम्मेदार और नैतिक उपयोग, डेटा गोपनीयता, और अकादमिक ईमानदारी पर भी चर्चा की गई, ताकि विद्यार्थी तकनीक को सहायक साधन के रूप में अपनाएँ, न कि शोध के विकल्प के रूप में।
दूसरे तकनीकी सत्र में डॉ. निकिता मट्टा द्वारा साहित्य समीक्षा (स्पजमतंजनतम त्मअपमू) पर केंद्रित प्रशिक्षण दिया गया, जिसमें प्रतिभागियों को यह बताया गया कि उपलब्ध शोध साहित्य को कैसे खोजें, कैसे पढ़ें, सारगर्भित नोट्स तैयार करें और विभिन्न स्रोतों को विषयानुसार तथा तर्कानुसार एक सुसंगत रूप में संश्लेषित करें। विद्यार्थियों को यह समझाया गया कि अच्छी साहित्य समीक्षा किसी भी शोध कार्य की रीढ़ होती है और यहीं से शोध अंतर (त्मेमंतबी ळंच) की पहचान भी संभव होती है।
दोपहर के सत्र “संदर्भ प्रबंधन, लाइब्रेरी उपयोग और प्लेज़रिज़्म से बचाव” में डॉ. अख़लाक़ अहमद द्वारा रेफरेंसिंग शैलियाँ (जैसे ।च्।, डस्। आदि), उद्धरण के सही तरीक़े, विश्वविद्यालय पुस्तकालय एवं ऑनलाइन डेटाबेस का प्रभावी उपयोग, तथा प्लेज़रिज़्म से बचने के व्यावहारिक उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई। विद्यार्थियों को यह भी बताया गया कि डिजिटल युग में स्रोतों का सही उल्लेख न केवल अकादमिक गरिमा की शर्त है, बल्कि शोध नैतिकता की बुनियादी ज़िम्मेदारी भी है।
अंतिम तकनीकी सत्र “शोध पत्र कैसे लिखें?” में अकादमिक लेखन कौशल, शोध पत्र की संरचना (शीर्षक, सार, भूमिका, पद्धति, विश्लेषण, निष्कर्ष, संदर्भ), तर्क-विन्यास, भाषा के स्तर, और प्रकाशन की प्रक्रिया पर मार्गदर्शन दिया गया। सत्र में यह रेखांकित किया गया कि एक सशक्त शोध पत्र वही है जो स्पष्ट, सुसंगत और साक्ष्य-समर्थित तर्क प्रस्तुत करे, साथ ही लैंगिक संवेदनशीलता, आदिवासी परिप्रेक्ष्य और स्थानीय-सामाजिक न्याय के मुद्दों को केन्द्र में रखे।
दिन के अंत में वैलेडिक्टरी सत्र आयोजित हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए और बताया कि इस कार्यशाला ने शोध के प्रति उनके दृष्टिकोण को अधिक गंभीर, सजग और आत्मविश्वासी बनाया है। समापन सत्र में जुलाई 2026 में प्रस्तावित युवा शोधार्थी सेमिनार, मेंटरशिप कार्यक्रम तथा भविष्य में संभावित प्रकाशन योजनाओं की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। आयोजकों ने घोषणा की कि सत्रों की रिकॉर्डिंग विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि अन्य इच्छुक विद्यार्थी भी इन संसाधनों से लाभ उठा सकें और ‘मंडला 2026’ की यह पहल विश्वविद्यालय परिसर में समावेशी और जिम्मेदार शोध संस्कृति के स्थायी निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो।
मंडला 2026’ शोध लेखन कार्यशाला का द्वितीय दिनः
