– आयड़ जैन तीर्थ में चातुर्मासिक प्रवचन की धूम जारी
– साध्वियों के सानिध्य में अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की
उदयपुर, 21 नवम्बर। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में मंगलवार को चातुर्मासिक मांगलिक प्रवचन हुए। महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ के आत्म वल्लभ सभागार में सुबह 7 बजे दोनों साध्वियों के सानिध्य में ज्ञान भक्ति एवं ज्ञान पूजा, अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने परमात्मा के जिन मंदिर में दर्शन-पूजन, विधि करते समय हमें किन-किन बातों का विशेष रूप से ध्यान देना होता है. इस विषय में साध्वियों ने आठवां आलंबन त्रिक में बताया कि मन को सूत्र न अर्पण आलंबन, वचन को सूत्र उच्चारण का आलंबन और काया को जिन बिंब का आलंबन लेना चाहिये। चैत्यवंदन करते वक्त मन-वचन-काया के तूफानी घोड़े उन्मार्ग मैंन चले जाय, इस हेतु से तीनों योगों के घोड़े को तीन आलेबनों के आला स्तंभ के साथ बाघ देना चाहिये। मनके पोड़े को सूत्र के अर्थ के आलंबन से बांध देना चाहिये। बचन के घोड़े को सूत्र के शुद्ध उच्चारण के आलंबन से बांध देना चाहिये। कामा के घोड़े को जिन बिंब के तथा चैत्यवंदन की विभिन्न मुद्धाओं के आलंबन से बांध देना चाहिये। इस प्रकार तीनों योगों का विभिन्न आलेबरो द्वारा स्थिर करके भक्ति योग में तसकार बनना इसीसा नाम है मालेचन त्रिसा आलंबन यानी आधार कोई भी आराधना आधार-आलंबन के जिना नहीं हो सकती । मानव का मन ही ऐसा है कि आलंबन या आधार के बिना नह एकाग्र नहीं बन सकता। आधार मिलने के बाद तन्मम बनने में देर नहीं लगती। दुनिया के आलेबनों में तो चिन को कई बार दुषित और मलीन किया है, अब तो प्रभु के जिनालय में ऐसे चंचल और मलीन मन को आलंबन विक से आराधना में स्थिर करना है। सुपरफास्ट की तरह घडाघड सूत्र नहीं बोलना है। क्योंकि उसमें अर्थ तो समझ में नहीं आता साथ ही साथ सूत्र के पद और संपदा भी जात नहीं हो पाते हैं। भावोल्लास व एकाग्रता पूर्वक आराधना करना है। चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
आलांबन त्रिक के द्वारा अपने योगों को स्थिर करके भक्ति करें : साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री
