– आयड़ जैन तीर्थ में अनवरत चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन
– चातुर्मासिक प्रवचन श्रृृंखला का आठवां दिन
उदयपुर 09 जुलाई। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्यपूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में रविवार को विशेष चातुर्मासिक मांगलिक प्रवचन हुए। महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ के आत्म वल्लभ सभागार में सुबह 7 बजे दोनों साध्वियों के सानिध्य में ज्ञान भक्ति एवं ज्ञान पूजा, अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने कहा कि दश वैकालिक सूत्र के प्रथम अध्याय के प्रथम लोक में शय्यंभव सूरिजी महाराज ने धर्म के मुख्य तीन अंग बताये हैं. जो अपने आप में मंगल स्वरूप हैं। “धम्मो मंगल मुक्किटुं अहिंसा संजमोतवो” अहिंसा, संयम और तप इस पद से समझ सकते हैं कि विश्व में यदि कोई श्रेष्ठ से श्रेष्ठ भगवान द्वारा प्रतिपादित धर्म ही मेरा धर्म है। आत्मा के लिये धर्म अमृत है, धर्म ही आत्मा और उत्तम से उत्तम वस्तु है तो एकमात्र धर्म ही है। केनलि पन्चत धम्मं – वीतराग सर्वज को अमर बनाता है. धर्म ही आत्मा का रक्षण करता है, क्योंकि धर्म ही आत्मा को जन्म-मरण के पंजे से मुक्त करवाता है। परमात्मा और गुरु धर्म देने वाले है, परमात्मा द्वारा बताई गई क्रियाएं धर्म साधन है, क्रियाओं के द्वारा ही धर्म को साधा जा सकता है। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
धर्म आत्मा को जन्म मरण से मुक्त करता है : साध्वी वैराग्यपूर्णाश्री
