परमात्मा की नैवेद्य पूजा से अणाहारी पद की प्राप्ति होती है :  साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री  

– आयड़ जैन तीर्थ में अनवरत बह रही धर्म ज्ञान की गंगा  
– साध्वियों के सानिध्य में अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की  
उदयपुर 18 अक्टूबर। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में बुधवार को नैवेध पूजा के महत्व के बारे में जानकारी दी। महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ के आत्म वल्लभ सभागार में सुबह 7 बजे दोनों साध्वियों के सानिध्य में आरती, मंगल दीपक, सुबह सर्व औषधी से महाअभिषेक एवं अष्ट प्रकार की पूजा-अर्चना की गई। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि विशेष महोत्सव के उपलक्ष्य में प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा   ने अष्ट प्रकारी पूजा के विधि के क्रम में आज सातवीं पूजा नैवेध पूजा के महत्व के विवेचन करते हुए कहा कि परमात्मा के समक्ष नैवेद्य अर्पण करते यह चिन्तन करे कि हे परमात्मा! जन्म-मरण के जंजाल में फँसे मुझे पर भव में अनंत बार – अणाहारी रहने का यानि विग्रह गति के समय मतलब एकगति से दूसरी गति में जाते समय जो कि वह इतना सूक्ष्म काल समय होता है जो कि केवल ज्ञानी की दृष्टि से भी उसका विभाग नहीं हो सकता ऐसे समय में ही अवाहारी रहने का कर्मसत्ता के कारण बना परन्तु वह योग पूर्ण होते ही सीधी जन्म की सजा आरम्भ हुई। अब संस्तर में परिभ्रमण कराने वाली आहार संज्ञाको त्यागने और अनाहारी पद मोक्ष की प्राप्ति के लिए आपके चरणी में यह नैवेध रखता है। जिसके प्रभाव से मेरी आहार सेना विनर हो ऐसी अभिलाषा व्यक्त करता हूँ । हे अणाहारी परमात्मा आप ऐसे स्थान पर बिराजमान हैं, जहाँ कदापि आहार की जरूरत नहीं पड़ती। इस आहार संज्ञा के पाप से ही मैं भवो भव भटका हूँ। एक भी भव में खाये बिना नहीं रहा है, जहाँ भी गया, आहार के पुद्गल ग्रहण करते रहा और उन पर राग व शासकी रखकर कर्म बांधना रहा। विशेष रूप से कहा कि चार प्रकार का आहार परमात्मा को चढ़ाने की बात आती है- अशन यानि पकाए गए चावल, कंसार, दलिया, दाल-रशीद पाण-गुड-शक्कर का पानी आदि खादिन, फल, सूखा मेवा आणि, स्वादिम – नागरवेल के पान, सुपारी आदि – परमात्मा को अर्पण करना चाहिए। चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर पर्युषण महापर्व के तहत प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।

By Udaipurviews

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