उदयपुर, 26 अक्टूबर। केशवनगर स्थित अरिहंत वाटिका में आत्मोदय वर्षावास में शनिवार को हुक्मगच्छाधिपति आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने फरमाया कि सभी जीवों को समय समान मिला है। कुछ जीवों को शब्द शक्ति मिली है। इनसे कुछ कम जीवों को सम्पत्ति मिली है। उससे भी कम जीवों को सौंदर्य एवं उनसे भी कम जीवों को समझ मिली है। कहलाने को सभी समझदार कहलाते हैं पर वास्तव में समझदार होते नहीं। जो समझदार होते हैं वे मिली हुई वस्तु का सदुपयोग कर पुण्य कमाते हैं। जो मिली हुई वस्तु का दुरूपयोग करते हैं वे पाप कमाते हैं एवं मिली हुई वस्तु का त्याग करना धर्म है। श्रोता जब सत्संग एवं संत समागम करते हें तो उनमें अभिगम रूचि पैदा होती है। ग्यारह अंग, प्रकीर्णक, दृष्टिवाद आदि का अर्थ सहित श्रुत ज्ञान प्राप्त करना ही अभिगम रूचि है। हम समझदार, प्रज्ञावान एवं विवेकवान बनें एवं गुरूजनों के चरणों में बैठ कर अभिगम एवं विवेकवान बनें एवं गुरूजनों के चरणों में बेठक अभिगम रूचि जगाएं। उपाध्याय श्री जितेश मुनि जी म.सा. ने कहा कि मार्गानुसारी के 35 बोलों में से एक बोल है दूरदृष्टा बनना। दूरदृष्टि रखने वाला कार्य का हेतु एवं परिणाम को ध्यान में रखकर ही प्रवृत्ति करता है। यदि आप सेवा कार्य कर रहे हैं तो बिना किसी अपेक्षा के करें। जिस कार्य में माता-पिता आदि बड़े लोगों का आशीष जुड़ता है उस कार्य में सफलता मिलती ही है। श्रद्धेय श्री विदित मुनि जी म.सा. ने उत्तराध्ययन की मूल गाथाओं का वाचन किया। आज प्रवचन में हिंगणघाट एवं बीकानेर के श्रद्धालु उपस्थित थे।
मिली हुई वस्तु का दुरूपयोग करना पाप है, जबकि त्याग करना धर्म है : आचार्य विजयराज
