उदयपुर। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ की ओर से सिंधी बाजार स्थित पंचायती नोहरे में श्रमण संघीय प्रवर्तक सुकन मुनि महाराज ने चातुर्मास के अवसर पर प्रातः कालीन धर्म सभा में कहा कि दुनिया में सुख-दुख देने वाला कोई नहीं है। सुख और दुख तो अपने कर्मों का फल होता है। जैसा हम कर्म करेंगे उसका फल भी हमें वैसा ही मिलेगा। अगर हमने दुनिया में अच्छे कर्म किए हैं तो हमारे पुण्य कर्मों का भी उदय होगा।
अगर हमने बुरे कर्म ही किए हैं बुरे काम ही किए हैं बुरा ही सोचा है तो हमारे बुरे कर्मों का उदय होगा। अच्छे कर्मों का फल सुख के रूप में मिलता है तो बुरे कर मौका पर दुख के रूप में। संसारी प्राणी के सुख-दुख में किसी का कोई दोष नहीं है स्वयं अपने कर्मों का ही दोष है। मिच्छामी दुकड़म यह संसार का परम वाक्य है। इसमें व्यक्ति के पूरे जीवन का सार समाहित है। शब्दों को घटने बढ़ने से कुछ नहीं होता है। शब्द और वाणी की बड़ी महिमा होती है। जो गुरु के सानिध्य मैं रहा उनकी वाणी को सुना उनके वचनों को सुना। जिसने गुरु राज्यों की वाणी को जीवन में उतार लिया उसका जीवन सफल हो गया। और जो धर्म आराधना से दूर रहा, गुरुवाणी से दूर रहा और गुरु सानिध्य में नहीं गया वह संसार में भटकता ही रहा है।
उप प्रवर्तक अमृतमुनि ने शब्दों का महत्व बताते हुए कहा कि अदालत में अगर कोई कैसे चलता है तो सभी उसके लिए वकील करते हैं। वकील इसलिए करते हैं क्योंकि उसे शब्दों का ज्ञान होता है कब कहां और कैसे बोलना यह वकील को अच्छी तरह से पता होता है। उसे यह भी पता होता है कि एक शब्द से वह कैसे हार सकता है और एक ही शब्द उसे कैसे जीत भी सकता है। बोलना तो सभी जानते हैं लेकिन कहां कब और कैसे बोलना यह समझने वाली बात है। इसलिए जीवन में शब्दों का महत्व समझे क्योंकि शब्द ही कई सुख और दुख का कारण बन जाते हैं।
धर्म सभा में डॉ.वरुण मुनि ने भगवान महावीर के साधन कल का वृतांत सुनाते हुए कहा कि जो जो भगवान के केवल ज्ञान का भक्ति नजदीक आया क्यों उनके ऊपर संकट और गहराते गये। लेकिन वह तो साक्षात प्रभु महावीर स्वामी थे इसलिए उन पर किसी भी प्रकार के संकट का कोई असर नहीं हुआ। वर्तमान बढ़ाओ को पार करते हुए दृढ़ता के साथ अपनी साधना में लग रहे।
महामंत्री एडवोकेट रोशन लाल जैन ने बताया कि चातुर्मास काल से लेकर अभी तक लगातार नवकार महामंत्र के जप्यानुष्ठान एवं घर आराधना लगातार चल रही है। धर्म सभा में बाहर से आए हुए अतिथियों का स्वागत अभिनंदन किया गया।
सुख-दुख स्वंय के कर्मो का फलः सुकन मुनि
