परमात्मा की पूजा उपशान्त भाव, अविचल धाम प्राप्त करवाता है : साध्वी वैराग्यपूर्णा
– आयड़ जैन तीर्थ में चातुर्मासिक प्रवचन की धूम जारी
उदयपुर 05 अक्टूबर। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में गुरुवार को चातुर्मासिक मांगलिक प्रवचन हुए। महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ में पांच दिवसीय महोत्सव का आयोजन शुक्रवार 6 अक्टूबर से प्रारम्भ होकर मंगलवार 10 अक्टूबर को सम्पन्न होगा। जिसमें प्रथम दिन पद्मावती माता का जाप एवं एकासना अनुष्ठान होंगे, दूसरे दिन पाश्र्वनाथ पंच कल्याणक पूजा, तीसरे दिन अठारह अभिषेक विधान, चौथे दिन महातपस्वी मुनिराज अनेकांत विजय का 53वां पुण्य दिवस पर आयोजन एवं पांचवें व अंतिम दिन पंजाब केसरी, युगवीर आचार्य देवश्रीमद् विजय वल्लभ सुरीश्वर महाराज का 69वां पुण्य दिवस धूमधाम से मनाया जाएगा। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने बताया कि परमात्मा ने हृदय रूपी कमल में उपगांत भाव पैदा किया और उसके बल से राग और द्वेष को जला दिया। में बताया उपशांत भाव शांत है और क्रोध भाव ऊष्ण है। तो शीत भाव को कैसे जलाये ? ऊष्ण भाव जलाता है। उसका जवाब कि जिस प्रकार हिम गिरता है तो पूरे वनखंड को जला देता है ठीक उसी प्रकार हे परमात्मा! आपने अपने ह्रदय में उपशांत भाव धारण करके राग और द्वेष को जला दिया है मैं भी इस हृदय पर तिलक करके संतोष मानता हूँ कि यह हृदय मुझे उपशांत भाव देगा। इस अंग की पूजा से उपयांत भाव की याचना करनी चाहिए। नौवां अंग नाभि – नाभि अंग के विवेचन में बताया कि इस नाभि कमल के नीचे आठ रूचक प्रदेश आये हुए हैं वह गाय के स्तन के आकार के है। उस आठ रूचक प्रदेश पर एक भी कर्म नहीं है, वे पूर्ण शुद्ध और पवित्र है। आत्मा के असंख्य आत्म प्रदेश है, उसमें आठ रुचक प्रदेश ही कर्म रहित है। इसलिए इन पर अनंत ज्ञान, मनंतदर्शन, अनंत चारित्र है, जिससे वह सकल गुणों का विश्राम स्थान है। उस नाभि कमल की पूजा करने से मेरी आत्मा के सभी आत्म प्रदेश कर्म रहित बन जाए और मुझे अविरल धाम रूपी मोक्ष प्राप्त हो जाये। इस प्रकार की भावना भाते हुए चिंतन करते हुए बहुत ही त पूर्वक आस्था सहित भाव सहित पूजा करनी चाहिए तभी हमारे कर्मों का क्षय होता है। चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
– आयड़ जैन तीर्थ में चातुर्मासिक प्रवचन की धूम जारी
उदयपुर 05 अक्टूबर। श्री जैन श्वेताम्बर महासभा के तत्वावधान में तपागच्छ की उद्गम स्थली आयड़ तीर्थ पर बरखेड़ा तीर्थ द्वारिका शासन दीपिका महत्ता गुरू माता सुमंगलाश्री की शिष्या साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री एवं वैराग्य पूर्णाश्री आदि साध्वियों के सानिध्य में गुरुवार को चातुर्मासिक मांगलिक प्रवचन हुए। महासभा के महामंत्री कुलदीप नाहर ने बताया कि आयड़ तीर्थ में पांच दिवसीय महोत्सव का आयोजन शुक्रवार 6 अक्टूबर से प्रारम्भ होकर मंगलवार 10 अक्टूबर को सम्पन्न होगा। जिसमें प्रथम दिन पद्मावती माता का जाप एवं एकासना अनुष्ठान होंगे, दूसरे दिन पाश्र्वनाथ पंच कल्याणक पूजा, तीसरे दिन अठारह अभिषेक विधान, चौथे दिन महातपस्वी मुनिराज अनेकांत विजय का 53वां पुण्य दिवस पर आयोजन एवं पांचवें व अंतिम दिन पंजाब केसरी, युगवीर आचार्य देवश्रीमद् विजय वल्लभ सुरीश्वर महाराज का 69वां पुण्य दिवस धूमधाम से मनाया जाएगा। जैन श्वेताम्बर महासभा के अध्यक्ष तेजसिंह बोल्या ने बताया कि प्रवचनों की श्रृंखला में प्रात: 9.15 बजे साध्वी प्रफुल्लप्रभाश्री व वैराग्यपूर्णा ने बताया कि परमात्मा ने हृदय रूपी कमल में उपगांत भाव पैदा किया और उसके बल से राग और द्वेष को जला दिया। में बताया उपशांत भाव शांत है और क्रोध भाव ऊष्ण है। तो शीत भाव को कैसे जलाये ? ऊष्ण भाव जलाता है। उसका जवाब कि जिस प्रकार हिम गिरता है तो पूरे वनखंड को जला देता है ठीक उसी प्रकार हे परमात्मा! आपने अपने ह्रदय में उपशांत भाव धारण करके राग और द्वेष को जला दिया है मैं भी इस हृदय पर तिलक करके संतोष मानता हूँ कि यह हृदय मुझे उपशांत भाव देगा। इस अंग की पूजा से उपयांत भाव की याचना करनी चाहिए। नौवां अंग नाभि – नाभि अंग के विवेचन में बताया कि इस नाभि कमल के नीचे आठ रूचक प्रदेश आये हुए हैं वह गाय के स्तन के आकार के है। उस आठ रूचक प्रदेश पर एक भी कर्म नहीं है, वे पूर्ण शुद्ध और पवित्र है। आत्मा के असंख्य आत्म प्रदेश है, उसमें आठ रुचक प्रदेश ही कर्म रहित है। इसलिए इन पर अनंत ज्ञान, मनंतदर्शन, अनंत चारित्र है, जिससे वह सकल गुणों का विश्राम स्थान है। उस नाभि कमल की पूजा करने से मेरी आत्मा के सभी आत्म प्रदेश कर्म रहित बन जाए और मुझे अविरल धाम रूपी मोक्ष प्राप्त हो जाये। इस प्रकार की भावना भाते हुए चिंतन करते हुए बहुत ही त पूर्वक आस्था सहित भाव सहित पूजा करनी चाहिए तभी हमारे कर्मों का क्षय होता है। चातुर्मास संयोजक अशोक जैन ने बताया कि आयड़ जैन तीर्थ पर प्रतिदिन सुबह 9.15 बजे से चातुर्मासिक प्रवचनों की श्रृंखला में धर्म ज्ञान गंगा अनवरत बह रही है।
