अरिहंत का हर रूप मंगल है जो हमारे विरोधों व अवरोधों को दूर करते हैं : आचार्य विजयराज

उदयपुर, 31 अगस्त। केशवनगर स्थित अरिहंत वाटिका में आत्मोदय वर्षावास में शनिवार को हुक्मगच्छाधिपति आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने फरमाया कि शरीर सभी को मिला है। संसारी शरीर का उपयोग मौज-मजे में करते हैं, जबकि साधक शरीर का उपयोग साधना में करते हैं, जिससे उनका उपयोग पवित्र बन जाता है। यही धर्म का मार्ग है। हम बुद्धि का उपयोग विवेक के जागरण में, मन का उपयोग मनन में, इन्द्रियों का उपयोग इन्द्रिय विजेता बनने में, धन का उपयोग पुण्योपार्जन में करने में, बल का उपयोग विनयवान बनने में और पद का उपयोग परम पद पाने में करें। अरिहंत पद पहला है, यह पद उपयोग को शुभ बनाने में बहुत बड़ा अवलम्बन है। अरिहंत का हर रूप मंगल है जो हमारे विरोधों को, अवरोधों को दूर करते हैं। जवाहराचार्य ने फरमाया कि अरिहंत प्रभु हैं नेड़ै तो तीन भुवन में कौन छेड़े? इसलिए चार शरण में प्रथम शरण अरिहंत प्रभु की है जो हमारा सुरक्षा कवच है। उपाध्याय श्री जितेश मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि बुद्धि दो प्रकार की होती है-कुबुद्धि और सुबुद्धि। समस्या पैदा  करने वाली एवं प्रपंच बढ़ाने वाली बुद्धि दुर्बुद्धि है, जबकि समाधान देने वाली एवं संसार घटाने वाली बुद्धि सुबुद्धि है। बुद्धि तो सभी को मिली है। इसका उपयोग कर ध्यान तो किया पर धन्यता नहीं पाई, सत्ता तो पाई पर आत्म सत्ता नहीं पाई, प्रसिद्धि तो पाई पर सिद्धि नहीं पाई। बुद्धिमान व्यक्ति अपनी बुद्धि का उपयोग अपनी आत्मा को बचाने के लिए करता है। मीडिया प्रभारी डॉ. हंसा हिंगड़ ने बताया कि आचार्यश्री एवं उपाध्यायश्री जी की सन्निधि में रविवार से प्रारम्भ आठ दिवसीय पर्युषण की आराधना करने के लिए चैन्नई, इरोड, गंगावती, मुम्बई, आंध्रप्रदेश, बैंगलोर, रायपुर, खरियार रोड़, राजनांदगांव, रतलाम, नीमच, बीकानेर, सूरत, नागदा जंक्शन, जयपुर, पूना एवं पूरे मेवाड़ के विभिन्न अंचलों से लगभग 250 श्रावक-श्राविकाएं पहुंच चुके हैं। सभी के लिए आवास की सुंदर व्यवस्था की गई है।

By Udaipurviews

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