विधायक श्री मेवाड़ ने सदन को अवगत कराया कि वर्तमान नियमों के तहत नाथद्वारा सहित माउंट आबू, जैसलमेर और पुष्कर जैसे चुनिंदा शहरों को विशेष रूप से इस प्रावधान से बाधित किया गया है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि नाथद्वारा को इस नियम के दायरे में लाने के पीछे न तो कोई ठोस कारण प्रस्तुत किया गया है और न ही इसके उद्देश्य का स्पष्ट स्पष्टीकरण दिया गया है।
उन्होंने कहा कि राजस्थान लैंड रेवेन्यू एक्ट 1956 में इस प्रकार के पृथक्करण का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, फिर भी 2012 में पारित इस नियम के कारण आम नागरिकों को अनावश्यक विलंब, असुविधा एवं विकास कार्यों में बाधा का सामना करना पड़ रहा है। इससे स्थानीय विकास प्रभावित हो रहा है और नागरिकों को प्रशासनिक जटिलताओं से गुजरना पड़ रहा है।
श्री मेवाड़ ने यह भी उल्लेख किया कि अन्य शहरों में भूमि उपयोग परिवर्तन की जिम्मेदारी स्थानीय निकायों को सौंपी गई है, जबकि नाथद्वारा जैसे शहरों में अलग प्रावधान होने से अनावश्यक जटिलताएं उत्पन्न हो रही हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पारदर्शी व्यवस्था, स्पष्ट दिशा-निर्देश और जवाबदेही तय किए बिना विकास संभव नहीं है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि नियमों की समीक्षा कर ऐसी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए जिससे अनियमितताओं एवं भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण हो, प्रक्रियाएं सरल हों और जनहित सर्वोपरि रहे।
उन्होंने सुझाव दिया कि शहरों की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पहचान को ध्यान में रखते हुए उनके विकास के लिए व्यावहारिक एवं संतुलित नियम बनाए जाएं। विकास कार्यों की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन को सौंपी जानी चाहिए ताकि जन सुविधा को प्राथमिकता देते हुए योजनाबद्ध विस्तार सुनिश्चित किया जा सके और शहर की पहचान भी सुरक्षित बनी रहे।
विधायक श्री विश्वराज सिंह मेवाड़ ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि उक्त नियम की पुनः व्यापक समीक्षा कर नाथद्वारा को राहत प्रदान की जाए, जिससे विकास की गति तेज हो, प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़े और आमजन को अनावश्यक परेशानियों से मुक्ति मिले।
नाथद्वारा की जनता के हितों की रक्षा, पारदर्शी प्रशासन और संतुलित विकास के लिए विधायक श्री मेवाड़ निरंतर प्रयासरत हैं।
