बसंत पंचमी पर्व, ऋतु परिवर्तन और चैतन्यता का द्योतक

उदयपुर 22 जनवरी। बसंत पञ्चमी एवं नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयंती की पूर्व संध्या पर गुरुवार को समुत्कर्ष समिति द्वारा “प्रकृति के संस्कार एवं श्रृंगार का पर्व है बसंत पंचमी” विषयक 142 वीं समुत्कर्ष विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें बसंती पर्व के साथ साथ नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भी याद किया गया।
गोष्ठी संयोजक एच डी शर्मा के अनुसार समुत्कर्ष विचार गोष्ठी में अपने विचार रखते हुए वक्ताओं ने कहा कि भारतीय संस्कृति में बसंत पंचमी का पर्व ऋतु परिवर्तन और चैतन्यता का द्योतक है। यह ‘सत्त्व गुण’ के जागरण का प्रतीक है, जहाँ साधक अपनी अंतश्चेतना में व्याप्त अज्ञान के तिमिर को नष्ट कर ब्रह्मज्ञान और विवेक की याचना करते हैं। साथ ही सामाजिक सौहार्द की दृष्टि से यह उत्सव प्राकृतिक उल्लास का पर्याय भी है। इस समय प्रकृति का कण-कण नव-पल्लवित होकर पीत आभा से मंडित हो जाता है, जो समृद्धि और उर्वरता का परिचायक है।
इस अवसर पर शिक्षाविद और विचारक पियूष दशोरा ने बसंत पञ्चमी के आध्यात्मिक एवं सामाजिक महत्त्व का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का पदार्पण एक युगांतरकारी घटना थी। सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रांतिचेता थेl जिनका जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक में हुआ; उन्होंने “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” और “दिल्ली चलो” जैसे नारे दिए l भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने और फिर आजाद हिंद फौज (INA) का गठन कर ‘जय हिंद’ का उद्घोष किया; वे क्रांतिकारी विचारों और सशस्त्र संघर्ष के पक्षधर थे l
विचार गोष्ठी में जगदीश चन्द्र चौबीसा ने मंगलाचरण का पाठ किया l इस अवसर पर माँ सरस्वती की स्तुति पर काव्य पाठ करते हुए चौबीसा ने बताया कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सुभाष चंद्र बोस का योगदान अद्वितीय और अत्यंत प्रभावशाली रहा है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के राजनीतिक विचार अत्यंत प्रगतिशील, यथार्थवादी और राष्ट्रवाद की गहरी भावना से ओत-प्रोत थे। उनका मानना था कि केवल अहिंसा से आजादी नहीं मिलेगी, इसके लिए सशस्त्र क्रांति और दुश्मन के दुश्मन को दोस्त बनाने जैसी अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति की आवश्यकता है।
गोष्ठी में शिक्षाविद श्यामसुंदर चौबीसा ने अपने संबोधन में कहा कि यह दिन विद्या, कला और संगीत की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती की आराधना को समर्पित है।
 साधक इस दिन को अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर आत्म-साक्षात्कार और बुद्धि की प्राप्ति के लिए अत्यंत शुभ मानते हैं। समाज में इसे नई शुरुआत का पर्व माना जाता है। बच्चों का ‘अक्षर ज्ञान’ अर्थात विद्यारंभ संस्कार इसी दिन से प्रारंभ होता है। किसान नई फसलों की खुशी मनाते हैं और लोग पीले वस्त्र पहनकर एकता और प्रसन्नता प्रदर्शित करते हैं।
तकनिकी विशेषज्ञ दुर्गेश श्रोत्रिय ने माँ सरस्वती को नमन करते हुए सुभाष चन्द्र बोस के बारे में बताया कि वे पुरुषों और महिलाओं के समान अधिकारों के हिमायती थे, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण ‘रानी झाँसी रेजिमेंट’ का गठन था। नेताजी का विचार था कि स्वतंत्रता के तत्काल बाद भारत की सामाजिक बुराइयों और गरीबी को दूर करने के लिए कुछ समय के लिए एक मजबूत केंद्रीय सत्ता (तानाशाही के तत्वों के साथ) की जरूरत हो सकती है ताकि देश को तेजी से पुनर्गठित किया जा सके।
समुत्कर्ष पत्रिका के उप संपादक गोविन्द शर्मा द्वारा आभार प्रकट किया गया l विचार गोष्ठी का संचालन सत्यप्रिय ने किया तथा सहयोग शिवशंकर खण्डेलवाल ने किया ।
इस ऑनलाइन विचार गोष्ठी में डॉ. दिनेश बंसल, विमल गुनेचा, गोपाल माली, राजेन्द्र कुमार कलाल, मुकेश जैन, त्रिभुवन चौबीसा, नर्बदा देवी, अमृत अग्रवाल, शिवलाल नायक, गिरीश कुमार चौबीसा, डॉ. किशन माली, चिराग सेनानी, रामेश्वर प्रसाद शर्मा, चैनशंकर दशोरा तथा सुरेश पंचाल भी सम्मिलित हुए।
By Udaipurviews

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