उदयपुर, 25 सितम्बर। केशवनगर स्थित अरिहंत वाटिका में आत्मोदय वर्षावास में बुधवार को धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए हुक्मगच्छाधिपति आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने कहा कि जहां तक भोजन में वैरायटियों की बात है तो इतिहास गवाह है कि प्राचीन काल में भी क्वालिटी का भोजन बनता था। आगमों में उल्लेख मिलता है चक्रवर्तियों के 700 रसोइये होते थे जो शुद्ध एवं लजीज भोजन बनाकर चक्रवर्तियों को परोसते थे। आज के युग में चाइनिज आदि वैराइटियां प्रचलित हो गई हैं। आज भोज्य पदार्थों में मिलावट बेशुमार हो गई है। मिलावट का ही असर है कि आज विचार, आहार एवं व्यवहार भी शुद्ध नहीं रहा। यदि रसोई में शुद्धता का रस बरसे तो जीवन सात्विक बनेगा, जीवन सहजता से धर्ममय बन सकेगा। संसार में चार शरण हैं-अरिहंत, सिद्ध, साधु एवं केवली प्ररूपित दयामय धर्म। संसारी पदार्थ रूप पुद्गलों की शरण में रहते हैं और साधक पुद्गलों से संघर्ष करते हुए सिद्ध-अवस्था को प्राप्त करने हेतु प्रयत्नशील रहते हैं। इसलिए कहा है-व्यापारियों का ध्यान मण में, विद्यार्थियों का ध्यान क्षण (समय) में एवं साधकों का ध्यान मन को जीतने में लगा रहना चाहिए। उपाध्याय श्री जितेश मुनि जी म.सा. ने कहा कि मान करने वाले की गति अधम होती है। मा अर्थात मार्ग एवं न अर्थात नरक। मान नरक का मार्ग है। मान व अहंकार रावण जैसों का भी न रहा तो हम किस खेत की मूली हैं ? जीवन को संवारना है तो अहं नहीं अदब करो, मद नहीं मदद करो। कलम अदब सीखाती है और फलों से लदा वृक्ष विनम्रता सीखाता है। श्रद्धेय श्री यशभद्र जी म.सा. ने कहा कि यह संसार नारियल के कवच जैसा है और उसमें रहने वाला गोला आत्मा जैसा है। हम संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त रहें।
यदि रसोई में शुद्धता का रस बरसे तो जीवन सात्विक बनेगा, जीवन सहजता से धर्ममय बन सकेगा : आचार्य विजयराज
