द्वेष को छोड़ने से ही पुण्य का अर्जन होता है : आचार्य विजयराज
उदयपुर, 19 जुलाई। केशवनगर स्थित अरिहंत वाटिका में आत्मोदय चातुर्मास में शुक्रवार को तेले की आराधना प्रारम्भ हुई जो गुरू पूर्णिमा को पूर्ण होगी। मीडिया प्रभारी डॉ. हंसा हिंगड़ ने बताया कि शुक्रवार को 500 तपाराधकों ने तेले तप की आराधना के प्रत्याख्यान आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. से ग्रहण किए। सभी आराधकों के तेले तप की पूर्णाहूति गुरू पूर्णिमा के दिन होगी एवं सामूहिक पारणा 22 जुलाई को होगा। वहीं शुक्रवार को धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए हुक्मगच्छाधिपति आचार्य श्री विजयराज जी म.सा. ने कहा कि मनुष्य पूरे जीवन राग और द्वेष में ही उलझा रहता है। राग इतना बुरा नहीं है क्योंकि वह जोड़ने का काम करता है किंतु द्वेष सदैव तोड़ने का काम करता है। संबंधों में खटास पैदा करने, दूरियां पैदा करने का काम द्वेष करता है। द्वेष के तीन दुष्परिणाम होते हैं पहला-द्वेष हमारे पुण्य का नाश करता है। पुण्यार्जन करने में बहुत अधिक समय लगता है पर नष्ट होने में कोई समय नहीं लगता। दूसरा-द्वेष हमारी प्रसन्नता का नाश करता है। प्रसन्नता न तो ली जा सकती है न दी जा सकती है, यह तो अंतरंग से क्रियेट की जाती है। प्रसन्नता संघर्ष, द्वेष, क्लेश को छोड़ने पर ही प्राप्त होती है। तीसरा-द्वेष जीव की मौलिकता एवं पवित्रता का नाश करता है। ऐसे द्वेष को देश निकाला दे दो। इसे छोड़ने पर ही पुण्य का अर्जन-सृजन आसान होता है, प्रसन्नता व पवित्रता बनी रहती है। उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनि जी म.सा. ने कहा कि हम गुणदर्शी बनें। दूसरों में गुणों को देखने की आदत हो जाने पर मन सदैव प्रमुदित रहेगा। दूसरों के गुण देखने वाले ही सम्यक्तवी जीव होते हैं।
500 तपस्वियों की तेला तप आराधना शुरू, आचार्यश्री जी से ग्रहण किए प्रत्याख्यान
