हिंदीपट्टी पर लिखी जाएगी जनादेश की पटकथा

उदयपुर। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में चुनावी महासमर के सात में से दो चरणों (19 अप्रैल व 26 अप्रैल) में लोकसभा की कुल 543 में से 190 सीटों के चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं। बैतुल (मप्र) से बसपा उम्मीदवार अशोक भलावी की 9 अप्रैल को हार्ट अटैक से मौत होने से चुनाव स्थगित कर दिया गया है, जो तीसरे चरण में 7 मई को होगा। मई में 07,13,20 और 25 तारीख को विभिन्न राज्यों की 297, सीटों के लिए चुनाव होंगे। शेष 57 सीटों के चुनाव सातवें और अंतिम चरण में 1 जून को होंगे। चार जून को मतगणना के बाद परिणाम घोषित किए जाएंगे।

राजस्थान की सभी 25 सीटों सहित 190 लोकसभा सीटों के लिए मतदान प्रारंभिक दो चरणों में पूर्ण हो चुका है। एनडीए ने जहां नरेन्द्र मोदी को तीसरी बार प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया है, वहीं विपक्ष का इंडी गठबंधन चेहरा विहीन है। हालांकि सबका फोकस युवा, महिला, किसान और गरीब के मुद्दों पर है।
बाजी जीतने के लिए वादे, दावों और आरोपों के हथियार तो चुनावों में चलते ही रहे हैं। पर इस बार भरोसे और गारंटी के एक के बाद एक कंटेनर भी खोले जा रहे हैं। जिनमें सबसे अधिक चर्चा मोदी की गारंटी और कांग्रेस की न्याय गारंटी की है। एनडीए 2047 तक देश को विकसित राष्ट्र, भारत को दुनिया की तीसरी अर्थ व्यवस्था बनाने, महिलाओं व वंचितों के सशक्तीकरण, किसानों के कल्याण, युवाओं के सर्वांगीण विकास की गारंटी दे रहा है साथ ही पिछले दस वर्षों के शासन की उपलब्धियों राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 का खात्मा, सडक़ों के विस्तार व सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास तथा नदियों को आपस में जोडऩे की शुरूआत से विपक्ष को घेर रहा है। न्याय की गारंटी से तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में जीती कांग्रेस इसे अपने गठबंधन के साथ राष्ट्रीय स्तर पर भुनाने के लिए आक्रामक है। वह बेरोजगारी और मूल्यवृद्धि का मुद्दा भी जोर शोर से उठा रही है। विपक्ष के इंडी अलायंस सहित तृणमूल कांग्रेस और वामदल एनडीए पर लोकतंत्र के खात्मे, केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग, गिनी चुनी कंपनियों को लाभ पहुंचाने और जो उसके दबाव को स्वीकार नहीं कर रही, उनके खात्मे का आरोप भी लगा रहे हैं।
इस चुनाव में सबकी निगाहें एक बार फिर हिंदी पट्टी के राज्यों पर हैं। लोकसभा में 225 सांसद भेजने वाले यह दस राज्य आजादी के बाद से अब तक दलों-गठबंधनों के लिए दिल्ली का रास्ता तैयार करते रहे हैं। बीते चुनाव में इन्हीं राज्यों में दमदार प्रदर्शन से भाजपा लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल करने की हसरत पूरी कर सकी। जब कि इन्हीं राज्यों के मतदाताओं ने कांग्रेस के लिए सत्ता का सूखा खत्म करना तो दूर उसे प्रतिष्ठा बचाने लायक भी नहीं छोड़ा।
इन राज्यों के मतदाताओं में हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, सनातन और सामाजिक न्याय के प्रति गहरा आकर्षण रहा है। बीते चुनाव में इन चारों ही मोर्चे पर भाजपा बेहतर बूथ प्रबंधन और बेहतर रणनीति की बदौलत अपने विरोधियों पर भारी पड़ी। कांग्रेस ने जहां इन राज्यों में अपने दम पर महज 5 सीटें हासिल की वहीं भाजपा ने 177 तो सहयोगियों के साथ 203 सीटें जीत कर विपक्ष की कमर इस तरह तोड़ी की आज 5 वर्ष बाद भी वह इन राज्यों में ठीक से खड़ी नहीं हो पाई है।
बिहार में आजमाइश
राज्य में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) और विपक्षी महागठबंधन इन्डी आमने सामने है। दोनों ही गठबंधनों में सहयोगी दलों की भरमार है। चुनाव से ठीक पहले जदयू को साध कर भाजपा ने विपक्ष को करारा झटका दिया है। राजद की अगुवाई में विपक्ष सामाजिक न्याय के सहारे राजग को घेरने की कोशिश में जुटी है। यहां राजग के साथ नीतीश, मांझी, कुशवाहा और लोजपा के चिराग पासवान हैं।
हिंदी पट्टी राज्यों की सीटें
हिंदी पट्टी में यूपी (80), बिहार (40), मध्यप्रदेश (29), झारखंड (14), राजस्थान (25), हरियाणा (10), दिल्ली (7), उत्तराखंड (5), हिमाचल (4), और छत्तीसगढ़ (11) सीटें शामिल हैं।
राजग के मुद्दे
भाजपा खासकर कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक नेताओं की हिंदी और हिंदीविरोधी टिप्पणी को मुद्दा बना रहा है। भाजपा ने इस क्षेत्र में हिंदुत्व और सामाजिक न्याय के बीच संतुलन बनाने के साथ सोशल इंजीनियरिंग के तहत कई क्षेत्रीय दलों को साधा है।
विपक्ष के मुद्दे
कांग्रेस की अगुवाई वाले इंडी अलाएंस ने हिंदी पट्टी में सामाजिक न्याय को अहम मुद्दा बनाया है। इसके तहत केंद्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना, जनादेश मिलने के बाद जाति की संख्या के आधार पर आरक्षण देने का वादा किया है। महंगाई और बेरोजगारी के सवाल को भी उठाया जा रहा है।
चुनौती भाजपा के सामने भी कम नहीं
बीते चुनाव में हिंदीपट्टी ने ही भाजपा की लगातार दूसरी बार धमाकेदार जीत को सुनिश्चित किया था। पार्टी ने तब सहयोगियों के सहारे 5 राज्यों राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल, उत्तराखंड और हरियाणा में क्लीन स्वीप किया था। गठबंधन को बिहार की 40 में से 39, झारखंड की 14 में से 12 और अपने दम पर मध्य प्रदेश की 29 में 28, छत्तीसगढ़ की 11 में 9 और यूपी की 80 में से 64 सीटें हाथ लगी थी।
जाहिर तौर पर अगर भाजपा ने पुराना प्रदर्शन नहीं दोहराया तो उसका 400 पार का नारा परवान चढ़ना तो दूर सत्ता बचाने के लिए संघर्ष करना होगा।
बसपा के साथ कांग्रेस-सपा, गठबंधन पर नजर
हिंदी पट्टी के केंद्र में उत्तर प्रदेश है, जहां इस बार नए समीकरण बने हैं। बसपा अकेले मैदान में है।
रालोद ने सपा का साथ छोड़ दिया है। भाजपा अपना दल, रालोद, सुभासपा और निषाद पार्टी के साथ मैदान में है।
बसपा, सपा दोनों के लिए यह चुनाव करो या मरो का सवाल है। भाजपा के सहयोगियों ने अगर बेहतर प्रदर्शन में मदद नहीं की तो इनकी प्रासंगिकता भी घटेगी।
कांग्रेस को आत्ममंथन की जरूरत
कांग्रेस अगर बीते दो चुनावों में नेता प्रतिपक्ष का पद हासिल करने में भी नाकाम रही तो इसका कारण हिंदी पट्टी में उसका निराशाजनक प्रदर्शन था। अब भी समय है कि आत्ममंथन करे और भूलों व चूकों पर मिट्टी डाले।
पार्टी इन राज्यों में से 6 में तो खाता तक नहीं खोल पाई। उसे 80 सीट वाले यूपीए, 40 सीट वाले बिहार, 29 सीट वाले मध्यप्रदेश में महज एक-एक और छत्तीसगढ़ में दो सीटें हासिल हुई थी। तब कांग्रेस की अगुवाई वाला यूपी भी महज छह सीट जीत पाया। जाहिर तौर पर हिंदी पट्टी में कांग्रेस को मतदाताओं से सहानुभूति हासिल करने की जरूरत है। इसमें नाकाम रहने पर उसका सत्ता का सूखा खत्म करने का सपना पूरा होना मुश्किल ही दिखाई पड़ता है। मेरा ऐसा मानना है कि यदि उदयपुर चिंतन शिविर के निष्कर्षों पर समय रहते अमल किया जाता तो कांग्रेस आज बेहतर स्थिति में होती।

-अमित शर्मा
हितैषी भवन,सूरजपोल अंदर, उदयपुर, राजस्थान।

By Udaipurviews

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