रविवारीय प्रवचन के बीच छलके कई बार श्रावक श्रविकाओं के आंसू
पृथ्वी से भारी माँ और अंबर से ऊँचे पिता होते है , माता पिता जो देते है उसका ऋण चुकाया नहीं जा सकता।यह बात शासनश्री मुनिश्री सुरेश कुमार जी ने रवियारिय प्रवचन के तहत माता पिता परिवार का आधार पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही उन्होंने कहा माँ ईश्वर का रूप होती है जिसके उच्चारण मात्र से होंठ गुलाबी जीभ मीठी हो जाती है और कलेजा भर आता है माँ ममता का मंगल कलश और त्याग का यश होती है वो ना होते तो ना महात्मा होते और ना परमात्मा होते कौन कहता है की बिना देखे प्यार नहीं होता हमे देखे बिना ही माँ कोख में ही प्यार करने लगती है वे महाप्रज्ञ विहार में चातुर्मास प्रवचन में उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित कर रहे थे उन्होंने कहा जिस दिन हमारी वजह से माता पिता के आँखों में आंसू आये उस दिन ज़िन्दगी भर की तपस्या उन आंसुओं के साथ बह जाएगी
बचपन से जो तुम्हें उँगली पकड़कर चलना सिखाया उन्हें रोज़ धर्मभाषा में ले जाना तुम्हारे कर्क पूरे हो जाएँगे
मुनि संबोध कुमार ‘मेधांश’ ने कहा माँ घर का गौरव तो पिता घर का वजूद होते है एक ख़ाना बनाती है तो दूसरे जीवन भर भोजन का प्रबंध करते है कभी ठोकर लगे तो ओह माँ शब्द चीख से निकलती है लेकिन रास्ता पार करते हुए कोई ट्रक अचानक ब्रेक लगाये तो बाप रे ही जीवन से निकलता है जो अपनी सारी ख़ुशियाँ हमपर न्योछावर कर देते है उन्हें अपनी ख़ुशियों से वंचित ना करे माता पिता का लार्ज तो इतना होता है कि हम अपनी चमड़ी की चादर बनाकर भी ओढ़ा दे तो भी उनके ऋण से उऋण नहीं हो सकते वो घर मंदिर होता है जिसके आँगन पर माँ बात का बसेरा हो आश्चर्य को एक माँ पाँच संतानों को ख़ुशी ख़ुशी परवरिश कर लेटी है लेकिन पाँच संतान मिलकर एक माँ की देखभाल नहीं कर सकते जिस अंश ने अपने अभिभावकों को वृद्धाश्रम में दाखिल किया वे भूले नहीं की जो हम देते है वही हमारे पास लौटकर आता है
इस अवसर पर मुनि सुरेश कुमार ने चतुर्दशी पर तेरापंथ का आधार स्तंभ मर्यादा पत्र का वाँचन किया कार्यक्रम से पूर्व भक्तमार अनुष्ठान व प्रेक्षा ध्यान का प्रयोग किया गया
