उदयपुर। समझ जाओ या समझाने की कुव्वत रखो, यह हो गया तो घर स्वयं ही शक्तिपीठ हो उठेगा। चारों धाम की यात्रा करे या नहीं, मगर माता-पिता को उनकी जरूरत के पलों में साथ रहे तो तीर्थ यात्रा स्वयं हो जायेगी । यह बात आचार्य महाश्रमण के आज्ञानुवर्ती शासन श्री मुनि सुरेश कुमार ने “तीर्थ बने अपना घर” विषयक रविवारीय प्रवचन को सम्बोधित करते हुए कही। उन्होने कहा – प्याज के छिलके निकालते हुए अब तक कोई किसी नतीजे पर नहीं पहुँचे। पर्स और जुबान को बहुत सोचकर खोलना चाहिए। पतंग तभी ऊँचाइयाँ छूती है जब डोर को ढील दी जाए, रिश्तें तभी सौंदर्य के शिखर पर होते है जब विचारों की पकड़ को ढीला छोड़ दिया जाए । संयुक्त परिवार की परंपरा को इसलिए मौत मिली क्योंकि यहाँ दो पिढ़ीयों के बीच विचारों की खाइया गहरी हो गइ। घर को अगर पावन तीर्थ धाम बनाना है तो एक ही ब्रह्न मंत्र अपना ले’ सहन करो- सफल बनो।
मुनि सम्बोध कुमार ‘मेधांश’ ने कहा- परिवार घने पेड़ जैसा होता है, जितनी खुबसुरती से उसकी देखभाल होगी उतनी ही उसकी उम्र लंबी होगी। सम्बंधों की परिभाषा है- साथ-साथ चलना – साथ निभाना। पारस्परिक प्रेम और तालमेल मखमली हो इसके लिए जरूरी है कि हम अतीत की बातों पर विस्मृति की मिट्टी डाले और आगे बढे। जहा अग्रजों के प्रति समर्पण और अनुज के लिए वात्सल्य हो वही घर शांति निकेतन है। घर और मकान में बहुत फर्क है, घर बनता है अपनो से और मकान बनता है ईट, चुने और पत्थरों से। एक दुसरे का दर्द कम करने वाले हमदर्द बनकर देखे खुशीयां दोगुनी हो जाती है। परिवार की अखंडता का एक असरदार मंत्र है- चाहे कैसी भी परिस्थिति में कोई भी हो सदा उसके साथ खड़े रहे और कहे-“टेंशन ना लो मैं हु ना” । घर में दीवार हर युग में बनते आए है, बस इतना याद रहे कि उस दीवार में कहीं दरार ना आए। बर्तन एक साथ होंगे तो शोर तो होना ही है। रिश्ते वह होता है जो बीती रात के झगड़े को आज की खुशी पर हावी नही होने देते।
घर में दीवार हो मगर दरार नहीं-मुनि सुरेश कुमार
