नरक की प्राप्ति हमारे कर्मों के अनुसार होती है : महासती विजयलक्ष्मी
उदयपुर, 27 जुलाई। श्री हुक्मगच्छीय साधुमार्गी स्थानकवासी जैन श्रावक संस्थान के तत्वावधान में केशव नगर स्थित नवकार भवन में चातुर्मास कर रही महासती विजयलक्ष्मी जी म.सा. के सानिध्य में रविवार को सामायिक एवं एकासना तप आराधना का आयोजन किया गया जिसमें 120 श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लिया। वहीं रविवारीय पाठशाला में 53 बच्चों ने भाग लिया।
श्रीसंघ अध्यक्ष इंदर सिंह मेहता ने बताया कि रविवार को तीन एवं पांच सामायिक एवं एकासना तप आराधना का आयोजन किया गया जिसमें 120 श्रावक-श्राविकाओं ने विभिन्न तप आराधना की। वहीं रविवारीय पाठशाला का दूसरा सत्र सम्पन्न हुआ जिसमें 53 बच्चों ने धर्म के मर्म को समझा। वहीं धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए महासती श्री विजयलक्ष्मी जी म.सा. ने कहा कि नरक की प्राप्ति हमारे कर्मों के अनुसार होती है। जो जीव अपने मन, वचन और काया को संयमित नहीं करता और अनाचार में प्रवृत्त रहता है, वह अधोगति को प्राप्त होता है। जीवन में सुख-दुख का आना-जाना स्वाभाविक है। परंतु यदि हम केवल सुख में ही रमते हैं और दुख आने पर व्याकुल हो जाते हैं, तो यह मानसिक दुर्बलता है। दुख के समय हमें धैर्य, सहनशक्ति और समझदारी से काम लेना चाहिए। पीड़ा को हमें बेचैनी का कारण नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर मानना चाहिए। शरीर में कभी-कभी रोग, विकार या व्याधियाँ आती हैं, जो बेचैनी उत्पन्न करती हैं, लेकिन यदि मन को साध लिया जाए तो भीतर शांति का अनुभव संभव है। जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियाँ आत्मसाधना का उपयुक्त समय होती हैं। उन्होंने क्षेत्र वेदना के 10 प्रकारों में से एक अनंत भूख एवं क्षुधा वेदना का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे उत्पन्न बेचैनी से बचने हेतु आंतरिक बल का विकास आवश्यक है। इससे पूर्व महासती श्री सिद्धिश्री जी म.सा. ने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल अच्छा पाना या करना नहीं, बल्कि अच्छा बनना भी है। इसके लिए सबसे पहले हमें अपने जीवन का केन्द्र बिंदु निश्चित करना होगा। आज अधिकांश लोगों ने अपने जीवन का केन्द्र पैसा बना लिया है, जबकि पैसा तीन प्रकार के कलंकों से युक्त होता है-यह न तो इस लोक में सच्चा साथ निभाता है, न परलोक में साथ जाता है और जब तक है, तब तक भी यह प्रसन्नता की गारंटी नहीं देता। जब तक जीवन में विवेक और आत्ममूल्यांकन की भावना नहीं आती, तब तक सत्संगति आवश्यक है। जैसी हमारी संगति होगी, वैसा ही हमारे भाव और विचार बनते जाएंगे। वातावरण का गहरा प्रभाव हमारी मनोवृत्तियों पर पड़ता है। सत्संग हमें अच्छा बनाने में सहयोगी है। यदि हम इसे प्राप्त करना चाहते हैं, तो पुरुषार्थ करना होगा। यह जीवन को श्रेष्ठ बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। श्रीसंघ मंत्री पुष्पेन्द्र बड़ाला ने बताया कि आज आयोजित कार्यक्रम की व्यवस्था व पुरस्कारी युवा संघ के सदस्यों एवं पदाधिकारियों ने सम्भाली।
120 श्रावक-श्राविकाओं ने की सामायिक एवं एकासन तपाराधना, 53 बच्चों ने सिखा धर्म-ध्यान
भगवान का नाम लेने के लिए मन में श्रद्धा, आत्मा में समर्पण और जीवन में तप आवश्यक : जिनेन्द्र मुनि
उदयपुर, 27 जुलाई। श्री वर्धमान गुरू पुष्कर ध्यान केन्द्र के तत्वावधान में दूधिया गणेश जी स्थित स्थानक में चातुर्मास का रहे महाश्रमण काव्यतीर्थ श्री जिनेन्द्र मुनि जी म.सा. ने रविवार को धर्मसभा में कहा कि भगवान का नाम लेना भी साधारण कार्य नहीं, इसके लिए मन में श्रद्धा, आत्मा में समर्पण और जीवन में तप की जरूरत है। गुरु कोई भी हो, उनके प्रति भेदभाव नहीं करना चाहिए। गुरु एक दीपक की तरह हैं जो अज्ञान के अंधकार को मिटाते हैं। भेदभाव से श्रद्धा खंडित होती है और धर्म की उन्नति रुक जाती है। असली अमीरी धन से नहीं, धर्म से है। करोड़ों के मालिक होकर भी अगर संयम नहीं, तो वह गरीबी है और भिक्षा में जीवन जीने वाला भी अगर समता, संयम और साधना में रत है, तो वह सच्चा अमीर है। श्री रविंद्र मुनि जी म.सा. ने कहा कि धर्म की सच्ची आराधना स्थानक में होती है, घर में नहीं। क्योंकि घर में तो राग-द्वेष, मोह-माया और लोभ की दीवारें खड़ी हैं, जबकि स्थानक में गुरु के चरण, शांति का वातावरण और आत्मशुद्धि का मार्ग होता है। धर्म केवल दिखावे का नाम नहीं, वह आत्मा का उत्थान है। केन्द्र अध्यक्ष निर्मल पोखरना ने बताया कि रविवार को तपस्या करने वाले तपस्वियों का बहुमान भी किया गया।
